Sunday, 24 November 2013

समाज और राष्ट्र के व्यापक हित में मतदान करें

प्रदेश में राजनीतिक दल सार्वजनिक हित जैसे सड़क बनवाने, पुल बनवाने, कारखाने लगाने, महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, अशिक्षा, गरीबी, आतंकवाद, नक्सलवाद, जातिवाद, रोजगार सृजन आदि आम जनता के ज्वलंत समस्याओं के समाधान करने के बजाय उन्हें व्यक्तिगत लाभ देने के वायदे जैसे कि कर्ज माफी, मुफ्त बिजली, मुफ्त सिलाई मशीन, मुफ्त रंगीन टेलीविजन, मुफ्त लैपटॉप, मुफ्त टेबलेट, मुफ्त स्मार्ट फ़ोन, मुफ्त रेडियो, मुफ्त साइकिल बांटने जैसी योजनाओं के बदौलत वोट बटोरने में लगी हुई है।
राजनितिक दल योजनाओं के नतीजे भले ही कितने भी क्रांतिकारी बताये जा रहे हों, लेकिन मूल रूप में ये सब "वोट के बदले नोट" देने जैसा ही है।
मध्यप्रदेश के सभी सम्मानीय मतदाताओं से अनुरोध है कि क्यिप्य २५ दिसंबर को व्यक्तिगत लाभ के बजाय समाज और राष्ट्र के व्यापक हित में मतदान करें।

Tuesday, 6 August 2013

भारत में राजनीती उद्द्योग का विकाश

           
भारत में राजनीती एक उद्योग (Industry) का रूप ले चुकी है, जिसका उद्देश्य धनोपार्जन मात्र बन गया है। वर्तमान में सभी राजनितिक पार्टियाँ अपनी कम्पनी अर्थात पार्टी को अलग ब्रांड नेम से चला रहा है।
कोई अपने पार्टी चलने के लिए समाजवाद को अपना ब्रांड नेम बनता है और फिर परिवारवाद चला रहा है तो कोई दलित उत्थान के ब्रांड नेम के साथ दलितों के कल्याण के पैसे से स्मारक बनवाता है।
           इतना ही नहीं कुछ राजनितिक पार्टियाँ तो मन्दिर – मस्जिद को हिन् अपना ब्रांड नेम बना चुकीं है और इसी ब्रांड नेम के सहारे अपनी राजनीती की दुकान चला रहें है।
इन सबके बिच कोई बंश वाद के सहारे सत्तासीन है, तो कोई टोपी पहन कर अपनेआप को धर्मनिरपेक्षता का श्वघोसित ठेकेदार साबित करने पर तुला है और डर की राजनीती से अपना "राजनितिक उद्योग" चलने में व्यस्त है।
कोई अल्पसंख्यकों के नाम पर तो कोई बहुसख्यक वर्ग के हितो को बाट कर अपना खजाना भरने में व्यस्त है।
अगर देखा जाये तो इनसब के लिए दोषी कही न कही इनके झूठे नारों और प्रलोभनों में आकर इनका समर्थन करने वाले लोग हीं है, जो जाती, धर्म, भाषा और झूठा अपनापन के आस मे अपने और आने बाली पीढयो के साथ-साथ समाज और देश को भी गर्त ढकेल रहें है।

Saturday, 3 August 2013

लोकतंत्र या "भ्रष्ट्रतंत्र"?

उत्तरप्रदेश के गौतमबुद्धनगर जिला में जिस प्रकार से सिर्फ सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने मात्र की आशंका से एक शांत और अपने काम में लगी रहने वाली महिला IAS अधिकारी दुर्गा शक्ति को जहाँ मात्र  41 मिनट में सस्पेंशन लेटर थमा दिया जाता है वही पिछले साल मथुरा के कोसीकलां में हिंसा हुई, उसमें किसी को निलंबित नहीं किया गया। प्रतापगढ़ में एक समुदाय के मकान जला दिए गए, लेकिन डीएम के खिलाफ कोई कार्रवाई तक नहीं हुई।
            इसी तरह बरेली में दो-दो दंगे हुए, लखनऊ, इलाहाबाद, मेरठ, मुजफ्फरनगर भी साम्प्रदायिक दंगों का शिकार हुआ लेकिन यहां किसी आईएएस अफसर पर कोई भी कार्यवायी  नहीं की गई।
           फैजाबाद दंगों में भी किसी आईएएस के खिलाफ कोई कार्यवायी नहीं की गई। यही नहीं पशु तस्‍करी मामले में पिछले साल जब् गोंडा के एसपी ने एक स्टिंग ऑपरेशन कर लिया और उसमें एक राज्यामंत्री का नाम सामने आया तो यूपी सरकार ने बजाए उस राज्य मंत्री पर कार्यवायी करने के उलटे एसपी को ही पद से हटा दिया
          उत्तरप्रदेश के  403 सदस्यों वाले सदन में 47 फीसदी विधायक 189 विधायक दागी हैं। जबकि 2007 में 140 दागी विधायक सदन में थे। इस दफा चुने गए विधायकों में से 98 के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले हैं। सपा के 224 विधायकों में से 111 दागी हैं।
जून 2012 में विधानसभा सत्र के दौरान मुख्यमंत्री ने स्वीकार किया था कि 1 मार्च से 15 अप्रैल के बीच प्रदेश में 669 हत्याएं, 35 डकैतियां, 263 बलात्कार 429 लूट और वाहन चोरी के 3256 मुक़दमें प्रदेश के विभिन्न थानों में दर्ज किये गये थे।
क्या यही है लोकतंत्र?

Friday, 2 August 2013

आखिरकार हो हीं जायेगा भारत का 29वाँ टुकड़ा

               भारत में छोटे राज्यों का गठन कोई नयी बात नहीं है. समय-समय पर यहाँ नए नए राज्यों के गठन की मांग  उठते रहे है, उन्ही में से एक है "तेलंगाना" जो वर्तमान में तो आंध्रप्रदेश राज्य का हिस्सा  है किन्तु जल्दी ही भारत के नक़्शे पर यह 10 ( मेडक, महबूबनगर, आदिलाबाद, निजामाबाद, करीमनगर. हैदराबाद, खम्मम, नलगोंडा, वारंगल, रंगारेड्डी) जिलों के साथ एक नए राज्य के रूप में दिखेगा।
               लोकसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही केंद्र सरकार ने आंध्र प्रदेश में अलग तेलंगाना राज्य बनाने का मन बना लिया है। इस मामले में पिछले दिनों कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन ने मुहर लगा दी थी।  हमेशा की तरह इस बार भी इस नए राज्य के गठन  जहाँ कुछ लोग खुश है तो वहीं दूसरी तरह बहुत से लोग आंध्रप्रदेश के विभाजन के इस फैसले से नाराज भी है।
        तेलंगाना के गठन के सरकार की इस फैसले बाद अब  बुंदेलखंड, हरित प्रदेश, विदर्भ, पूर्वांचल, गोरखालैंड, बोडोलैंड जैसे छोटे राज्यों के गठन की मांग ने जोर पकड़ लिया है।
देखना अब यह है की  टुकड़े होंगे भारत के। 

Thursday, 7 March 2013

आखिर कब जागेगी जनता?

     हम हमेशा से देखते आ रहे है की भारत में समय-समय पर सामाजिक बदलाव की लहर तेजी से उठती है किन्तु बिना किसी नतीजे पर पहुचे ही उन्हें भुला दिया। अभी कुछ दिनों पहले गुड़गांव में एक लड़की को कुछ दरिंदे अपनी हवस का शिकार बनाया और मीडिया इस मामले को खूब उछालकर सुरक्षा दावों पर उंगली उठाता रहा. आम जनता भी विरोध में हल्ला मचाती है और फिर कुछ दिन बाद सब कुछ भूलकर अपने-अपने कामों में व्यस्त हो गए। उसके बाद दिल्ली का धौला कुआं रेप केस भी सुर्खियां बटोरता रहा। सड़कों पर कैंडल मार्च निकाला जाता रहा और फिर वही हुआ जो हर बार होता आया है, हम फिर सब कुछ भूल गए। आए दिन कोई ना कोई महिला किसी ना किसी वहशी दरिंदे का शिकार होती रहती है। लेकिन पता नहीं क्यों यह मसला हमें कुछ दिन तक ही प्रभावित करता है फिर हमारी संवेदना अचानक ही कहीं गुम हो जाती है।
अगर महिला सुरक्षा की बात छोड़ भी दी जाये तो अन्य मशलों पर भी हमारे देश में यही होते रहा है कि हम कुछ दिनों तक तो खूब हो-हल्ला मचाते है और भी सब भूल के अपने अपने कम में लग जाये है, और नतीजा 'ढाक के तीन पात'.

अगर हम समाज के लिए नासूर बन चुके भ्रष्टाचार को समाप्त करने के उद्देश्य से इंडिया अगेंस्ट करप्शन जैसे आन्दोलन पर एक नजर डालें तो वहां भी हमें कुछ वैसा ही देखने को मिलेगा जैसा कि हमेशा से हम देखते आ रहे है।
अन्ना हजारे जैसे समाज सेवक ने वृद्धावस्था में जो भ्रष्टाचार मुक्त समाज के लिए जिस आन्दोलन कि शुरुआत किया उसे मीडिया ने भी खूब हाईलाइट किया, और जन समर्थन भी खूब मिला। दिनभर टेलीविजन पर अन्ना और उनके आन्दोलन कि हिन् गूंज सुनाई पड़ती थी। लेकिन यह आन्दोलन जब तक अपनी मंजिल तक पहुच पता उससे पहले हीं आम जनता ने फिर उन्हें भुला दिया और नतीजा वही जिसके शायद अब तक हम आदी हो चुके हैं। जिस तेजी के साथ अन्ना नाम के तूफान ने दस्तक दी थी, उससे भी ज्यादा तेजी के साथ यह तूफान थम गया. इसके लिए जिम्मेदार हम स्वमेव है जिसके के वजह से आज भी जनलोकपाल बिल का मसला अधर में ल।का हुआ है।
हम पुलिस और प्रशासन पर अपना क्रोध प्रकट करने के लिए विभिन्न हथकंडों को अपनाते है, किन्तु सरकार और प्रशासन यह बात बहुत अच्छी तरह मालूम है कि आम जनता की याद्दाश्त बहुत कमजोर है। जनता विरोध स्वरुप बस कुछ दिन तक हल्ला मचाती है फिर सब कुछ भूल कर अपनी-अपनी दिनचर्या में उलझ जाते हैं.इसी कारण से आज तक ना तो कभी सरकार और ना ही सुरक्षा तंत्र कोई सख्त कदम उठाना जरुरी समझता है।
ऐसे में एक सवाल जो हमेशा में मेरे मन में उठता रहा है कि:
समाज के वर्तमान दशा के लिए सिर्फ सरकार और प्रशासन को दोष देना उचित है?
क्या हम इन सब घटनाओं के लिए दोषी नहीं है?

Saturday, 9 February 2013

अफजल को फाँसी! कितना उचित?

दोस्तों एक तरह आज सुबह पूरा देश अफजल के फाँसी को लेकर खुसिओन से झूम उठा है वहीँ इस के दुसरे पक्ष से अभी तक अनभिज्ञ है.
सिर्फ तकनीकी कारणों गांधीजी की ह्त्या के केस में सज़ा से बचने वाले सावरकर जी की उसी संसद में आज फोटो लगी हुई है। वहीँ बिना सबूत, बिना पूरी सुनवाई अगर किसी को सिर्फ इसलिए फांसी दे दी जाय की देश की संसद पर हमला हुआ है और लोगों की भावनाओं का सवाल है,
सारी जिरह, बहस और सबूतों में कुछ न ढूंढ पाने के बाद कहा कि संसद पर इत्ता बड़ा हमला हुआ किसी को तो फंसी मिलनी चाहिए।मारे गए आतंकियों के फोन में इसका नंबर मिला है तो इसको फंसी दे दो। आतंकियों के फोन में पुलिस वालों का भी नंबर था, एस टी एफ वालों का, तो उनकों भी क्यों ना लटका दिया जाए?
यह हिन्दू तुष्टिकरण नहीं तो और क्या है?

Thursday, 7 February 2013

रोज डे

7 फ़रवरी! एक ऐसा दिन जिसे आज के समय में समाज का एक 'खाश' वर्ग रोज डे के रूप में मनाता है. इस दिन हमारे समाज का वह 'खाश' तबका एक दूसरे को गुलाब का फूल भेंट कर अपनी भावनाओं का इजहार करते हैं.
  अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता सभी को है और यह एक सीमा तक उचित भी है, किन्तु अपनी स्वतंत्रता की दुहाई दे कर समाज में सांस्कृतिक या अन्य तरीके से गंदगी फैलाना गलत है. आये दिन वैलेंटाइन के नाम पर हमारे समाज का वह 'खास' तबका ट्रेन, यात्री बस, मेट्रो और सार्वजनिक पार्क आदि जगहों पर खुलेआम प्रेमालाप, आलिंगन बद्ध या चुंबन में व्यस्त नजर आते हैं. उस समय समाज का वह 'खास' तबका शायद भूल जाता है कि हमारे साथ कई अन्य लोग भी इस समाज का हिस्सा है, जो ऐसी चीजों को सार्वजनिक स्थलों पर पसंद नहीं करते और ऐसी स्थिति में वे बेहद असहज महसूस करते हैं.हमारे संविधान में एक तरफ जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है वही दूसरी तरफ सार्वजनिक स्थलों पर अश्लील हरकतें करने पर दंड और जुर्माने का प्रावधान भी है, 
लेकिन क्या हमें नैतिकता सिखाने के लिए दंड ही एकमात्र रास्ता बचता है?
क्या हमारे समाज का वह 'खाश' वर्ग अपने लिए ऐसे नियम नहीं बना सकती जिससे वह समाज के बंधनों को तोड़े बिना अपनी आजादी मना सके?


Wednesday, 6 February 2013

आस्था का महापर्व कुम्भ


   कुम्भ  हिन्दुओं का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसका आयोजन प्रति बारहवें वर्ष में होता है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु  स्नान करते हैं। यह आयोजन हर तीन वर्ष के बाद नासिक, इलाहाबाद, उज्जैन और हरिद्वार में बारी-बारी से किया जाता है। इनमें प्रयाग कुम्भ सबसे भव्य और पवित्र माना जाता है। इस स्थान को ब्रह्मांड का उद्गम और पृथ्वी का केंद्र भी माना गया है। ऐसी मान्यता है कि ब्रह्मांड की रचना से पहले ब्रह्माजी ने यहीं अश्वमेध यज्ञ किया था।
     अभी हाल में हीं ब्रिटिश और भारतीय शोधकर्ताओं ने चार साल के गहन अध्ययन के पाया कि इलाहाबाद में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर आयोजित महाकुम्भ विश्व के सबसे विशालतम धार्मिक जमावड़े में से एक है और यह पृथ्वी पर सबसे बड़ा मेला है।
        कुम्भ सिर्फ एक हिन्दू पर्व ही नहीं बल्कि हमारी राष्ट्रीयता का प्रतीक है, जिसमे सभी पंथ और संप्रदाय के लोग सम्मीलित होकर 'हम भारतीय एक है' कि गवाही देते है और साक्ष्य बनते है: शैव, वैष्णव, शाक्त, अघोर पंथी, उदासी, सिक्ख, जैन और बौद्ध मतावलंबी। 
 
कुम्भ स्नान कि सार्थकता
   कुम्भ स्नान की सार्थकता तभी है जब पवित्र नदियों के जल को पवित्र रखा जाये।  सिर्फ मेला प्रशासन का ही नहीं बल्कि हमारा भी दायित्व है कि नदी के घाट पर एवं नदी में किसी तरह की गंदगी न फैले। हमें यथा सम्भव कोसिस करना चाहिए कि इस स्थान का महत्व और पवित्रता दोनों चिर स्थाई बने रहें।
लोक मान्यताओं के अनुसार गंगा जहां होती है, वह स्थान तपोवन हो जाता है और पवित्र नदियों का तट सिद्ध क्षेत्र है। यह स्थान दूषित न हो, इस बात का ध्यान रखना भी आवश्यक है, क्योंकि सही मायनों में कुम्भ स्नान तभी सार्थक होगा। 

कुम्भ पर्व का आयोजन 4 प्रकार से होता है.
  1. कुम्भ राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर कुम्भ का पर्व हरिद्वार में आयोजित किया जाता है। 
  2. मेष राशि के चक्र में बृहस्पति एवं सूर्य और चन्द्र के मकर राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या के दिन कुम्भ का पर्व प्रयाग में आयोजित किया जाता है। (एक अन्य गणना के अनुसार मकर राशि में सूर्य का एवं वृष राशि में बृहस्पति का प्रवेश होनें पर कुम्भ पर्व प्रयाग में आयोजित होता है।)
  3. सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुम्भ पर्व गोदावरी के तट पर नासिक में होता है।
  4. सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर यह पर्व उज्जैन में होता है।

अधिक जानकारी के लिए कृपया www.kumbhmelaallahabad.gov.in पर विजिट करें।

Tuesday, 5 February 2013

क्या यही है ग्लैमर वर्ल्ड!

रविवार को पोर्न स्टार सन्नी लियोन ने ट्वीट किया था कि बलात्कार अपराध नहीं बल्कि सरप्राइज सेक्‍स होता है। सन्‍नी लियोन का ये ट्वीट कई जगह छप गया। बहुत से लोगों ने ट्विटर पर उनके कमेंट को रीट्वीट भी कर दिया। विवाद बढ़ने के बाद सनी द्वारा स्वयं अपना यह ट्वीट डिलीट कर दिया और अपने फॉलोवर्स को धमकी भी दी कि वह अपने कमेंट्स और ट्वीट्स को डिलीट कर दें नहीं तो वह उन्हें ब्लॉक कर देंगी।
         भारत में यह कोई पहली घटना नहीं है जब अभिनेत्रियां/ अभिनेता सोशल नेटवर्किंग अकाउंट को पब्लिसिटी का माध्यम बनाते रहें हैं लेकिन इस बार जो हुआ उसने तो संवेदनहीनता की सारी हदें पार कर दी।
         खैर यह गलती उनकी नहीं हमारी है। एक तरफ हमारा समाज जहाँ प्रेम संबंध, जाति प्रथा आदि के प्रति तो अपने आप को सख्त रवैया अपनाते हुए दिखाता है, वहीँ दूसरी तरफ 'पोर्न वर्ल्ड' से आयी पोर्न स्टार सन्नी लियोन को पहले छोटे पर्दे और फिर बड़े पर्दे पर खूब हो-हल्ले के बाद  आम जनता ने भी उन्हें पूरी आत्मीयता के साथ स्वीकार किया। भला एक पोर्न स्टार से आप और उम्मीद भी क्या कर सकतें है...
      एक छोटे से ट्वीट ने समाज के उस वर्ग को आहत कर दिया जो गैंग रेप की घटना के बाद एकसाथ होकर आगे आये है। उन भावनाओं को क्षतिग्रस्त कर दिया जो उस मासूम पीड़िता के लिए जागी थीं।

Sunday, 3 February 2013

मौत का नंगा नाच: क्लिनिकल ड्रग ट्रायल


देश में 'क्लिनिकल ड्रग ट्रायल' पर कोई सख्त कानून नहीं होने के कारण नामीगीरामी डॉक्टर बेधड़क ड्रग ट्रायल करके कंपनियो से धन कमाते हैं और मरीज से भी पूरा पैसा वसूलते है. ट्रायल कि जानकारी मरीज या उसके परिजनों को देना तो दूर उससे बीमारी व इलाज के बारे में पूछने पर ये सीधे मुँह बात तक नहीं करते. इसमें बड़े शहरों के बड़े हॉस्पिटल भी सामील है जो की बिना किसी रोकटोक के ड्रग ट्रायल में लगे हुए है.इस मामले में मध्य प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा मंत्री का एक बयां जिसमे उन्होंने कहा था कि "इस मामले में कुछ नहीं किया जा सकता है", निराशा जनक है एवं डाक्टरों को जिस तरह बचाया जा रहा है उससे भ्रष्टाचार की बु आ रही है.
    अगर बात करें ड्रग ट्रायल के मामले की तो सर्वोच्चन न्यायालय में इसकी पीटीसन लगी है, जिसके बाद सरकार को कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए है. साथ ही राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, ड्रग कंट्रोलर और अनुसूचित जाति आय़ोग संज्ञांन ले चुका है. लेकिन सरकार की तरफ से सिर्फ खाना पूर्ति ही की गई है. हमारे विधि सलाहकार के अनुसार  एमपी सिविल सेवा आचरण अधिनियम 1965,भ्रष्टाचार अधिनियम 1988 और आईपीसी के तहत इन डाक्टरो के खिलाफ कार्यवाई की जासकती है. साथ हीं आईएमए के उल्लंघन 1956 धारा 20ए के उल्लंघन पर धारा 24 ए के अंतर्गत स्टेट मेडिकल कौंसिल विधि संगत कार्रवाई कर सकता है.

Friday, 25 January 2013

जब याद तेरी आती है

वो तेरा चाँद सा चेहरा,और
ऑंखें झील-सी गहरी.
वो तेरा लब कमल जैसी,
तेरी मुस्कान फूलों-सी.
चहकना चिड़ियों के जैसे,
वो हिरनी की तरह चलना.
वो कोयल सी तेरी बोली,
चुरा लेती है नींदों को,
जब याद तेरी आती है....
दिल की कलम से.

Wednesday, 16 January 2013

कोई तो साथी बन जाती


तन्हाई को दूर भगाती,
कोई तो साथी बन जाती।

दिल की बात समझती हर पल,
हर पल मेरा साथ निभाती।

मेरे गमों में शिरकत करती,
मेरे सारे स्वप्न सजाती।

भले खफा दुनिया हो जाती,
पर वह मुझसे दूर न जाती।

कठिनाई में साथ निभाती,
काँटों में भी रह दिखाती।

करूँ गलत तो वह समझाती,
मायूशी में मुझे हँसाती।

प्रेमभाव का पाठ पढ़ाती,
कोई तो साथी बन जाती।