Thursday, 7 February 2013

रोज डे

7 फ़रवरी! एक ऐसा दिन जिसे आज के समय में समाज का एक 'खाश' वर्ग रोज डे के रूप में मनाता है. इस दिन हमारे समाज का वह 'खाश' तबका एक दूसरे को गुलाब का फूल भेंट कर अपनी भावनाओं का इजहार करते हैं.
  अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता सभी को है और यह एक सीमा तक उचित भी है, किन्तु अपनी स्वतंत्रता की दुहाई दे कर समाज में सांस्कृतिक या अन्य तरीके से गंदगी फैलाना गलत है. आये दिन वैलेंटाइन के नाम पर हमारे समाज का वह 'खास' तबका ट्रेन, यात्री बस, मेट्रो और सार्वजनिक पार्क आदि जगहों पर खुलेआम प्रेमालाप, आलिंगन बद्ध या चुंबन में व्यस्त नजर आते हैं. उस समय समाज का वह 'खास' तबका शायद भूल जाता है कि हमारे साथ कई अन्य लोग भी इस समाज का हिस्सा है, जो ऐसी चीजों को सार्वजनिक स्थलों पर पसंद नहीं करते और ऐसी स्थिति में वे बेहद असहज महसूस करते हैं.हमारे संविधान में एक तरफ जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है वही दूसरी तरफ सार्वजनिक स्थलों पर अश्लील हरकतें करने पर दंड और जुर्माने का प्रावधान भी है, 
लेकिन क्या हमें नैतिकता सिखाने के लिए दंड ही एकमात्र रास्ता बचता है?
क्या हमारे समाज का वह 'खाश' वर्ग अपने लिए ऐसे नियम नहीं बना सकती जिससे वह समाज के बंधनों को तोड़े बिना अपनी आजादी मना सके?


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