देश में 'क्लिनिकल ड्रग ट्रायल' पर कोई सख्त कानून नहीं होने के कारण नामीगीरामी डॉक्टर बेधड़क ड्रग ट्रायल करके कंपनियो से धन कमाते हैं और मरीज से भी पूरा पैसा वसूलते है. ट्रायल कि जानकारी मरीज या उसके परिजनों को देना तो दूर उससे बीमारी व इलाज के बारे में पूछने पर ये सीधे मुँह बात तक नहीं करते. इसमें बड़े शहरों के बड़े हॉस्पिटल भी सामील है जो की बिना किसी रोकटोक के ड्रग ट्रायल में लगे हुए है.इस मामले में मध्य प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा मंत्री का एक बयां जिसमे उन्होंने कहा था कि "इस मामले में कुछ नहीं किया जा सकता है", निराशा जनक है एवं डाक्टरों को जिस तरह बचाया जा रहा है उससे भ्रष्टाचार की बु आ रही है.
अगर बात करें ड्रग ट्रायल के मामले की तो सर्वोच्चन न्यायालय में इसकी पीटीसन लगी है, जिसके बाद सरकार को कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए है. साथ ही राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, ड्रग कंट्रोलर और अनुसूचित जाति आय़ोग संज्ञांन ले चुका है. लेकिन सरकार की तरफ से सिर्फ खाना पूर्ति ही की गई है. हमारे विधि सलाहकार के अनुसार एमपी सिविल सेवा आचरण अधिनियम 1965,भ्रष्टाचार अधिनियम 1988 और आईपीसी के तहत इन डाक्टरो के खिलाफ कार्यवाई की जासकती है. साथ हीं आईएमए के उल्लंघन 1956 धारा 20ए के उल्लंघन पर धारा 24 ए के अंतर्गत स्टेट मेडिकल कौंसिल विधि संगत कार्रवाई कर सकता है.
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