भारत में राजनीती एक उद्योग (Industry) का रूप ले चुकी है, जिसका उद्देश्य धनोपार्जन मात्र बन गया है। वर्तमान में सभी राजनितिक पार्टियाँ अपनी कम्पनी अर्थात पार्टी को अलग ब्रांड नेम से चला रहा है।
कोई अपने पार्टी चलने के लिए समाजवाद को अपना ब्रांड नेम बनता है और फिर परिवारवाद चला रहा है तो कोई दलित उत्थान के ब्रांड नेम के साथ दलितों के कल्याण के पैसे से स्मारक बनवाता है।
इतना ही नहीं कुछ राजनितिक पार्टियाँ तो मन्दिर – मस्जिद को हिन् अपना ब्रांड नेम बना चुकीं है और इसी ब्रांड नेम के सहारे अपनी राजनीती की दुकान चला रहें है।
इन सबके बिच कोई बंश वाद के सहारे सत्तासीन है, तो कोई टोपी पहन कर अपनेआप को धर्मनिरपेक्षता का श्वघोसित ठेकेदार साबित करने पर तुला है और डर की राजनीती से अपना "राजनितिक उद्योग" चलने में व्यस्त है।
कोई अल्पसंख्यकों के नाम पर तो कोई बहुसख्यक वर्ग के हितो को बाट कर अपना खजाना भरने में व्यस्त है।
अगर देखा जाये तो इनसब के लिए दोषी कही न कही इनके झूठे नारों और प्रलोभनों में आकर इनका समर्थन करने वाले लोग हीं है, जो जाती, धर्म, भाषा और झूठा अपनापन के आस मे अपने और आने बाली पीढयो के साथ-साथ समाज और देश को भी गर्त ढकेल रहें है।

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