Thursday, 7 March 2013

आखिर कब जागेगी जनता?

     हम हमेशा से देखते आ रहे है की भारत में समय-समय पर सामाजिक बदलाव की लहर तेजी से उठती है किन्तु बिना किसी नतीजे पर पहुचे ही उन्हें भुला दिया। अभी कुछ दिनों पहले गुड़गांव में एक लड़की को कुछ दरिंदे अपनी हवस का शिकार बनाया और मीडिया इस मामले को खूब उछालकर सुरक्षा दावों पर उंगली उठाता रहा. आम जनता भी विरोध में हल्ला मचाती है और फिर कुछ दिन बाद सब कुछ भूलकर अपने-अपने कामों में व्यस्त हो गए। उसके बाद दिल्ली का धौला कुआं रेप केस भी सुर्खियां बटोरता रहा। सड़कों पर कैंडल मार्च निकाला जाता रहा और फिर वही हुआ जो हर बार होता आया है, हम फिर सब कुछ भूल गए। आए दिन कोई ना कोई महिला किसी ना किसी वहशी दरिंदे का शिकार होती रहती है। लेकिन पता नहीं क्यों यह मसला हमें कुछ दिन तक ही प्रभावित करता है फिर हमारी संवेदना अचानक ही कहीं गुम हो जाती है।
अगर महिला सुरक्षा की बात छोड़ भी दी जाये तो अन्य मशलों पर भी हमारे देश में यही होते रहा है कि हम कुछ दिनों तक तो खूब हो-हल्ला मचाते है और भी सब भूल के अपने अपने कम में लग जाये है, और नतीजा 'ढाक के तीन पात'.

अगर हम समाज के लिए नासूर बन चुके भ्रष्टाचार को समाप्त करने के उद्देश्य से इंडिया अगेंस्ट करप्शन जैसे आन्दोलन पर एक नजर डालें तो वहां भी हमें कुछ वैसा ही देखने को मिलेगा जैसा कि हमेशा से हम देखते आ रहे है।
अन्ना हजारे जैसे समाज सेवक ने वृद्धावस्था में जो भ्रष्टाचार मुक्त समाज के लिए जिस आन्दोलन कि शुरुआत किया उसे मीडिया ने भी खूब हाईलाइट किया, और जन समर्थन भी खूब मिला। दिनभर टेलीविजन पर अन्ना और उनके आन्दोलन कि हिन् गूंज सुनाई पड़ती थी। लेकिन यह आन्दोलन जब तक अपनी मंजिल तक पहुच पता उससे पहले हीं आम जनता ने फिर उन्हें भुला दिया और नतीजा वही जिसके शायद अब तक हम आदी हो चुके हैं। जिस तेजी के साथ अन्ना नाम के तूफान ने दस्तक दी थी, उससे भी ज्यादा तेजी के साथ यह तूफान थम गया. इसके लिए जिम्मेदार हम स्वमेव है जिसके के वजह से आज भी जनलोकपाल बिल का मसला अधर में ल।का हुआ है।
हम पुलिस और प्रशासन पर अपना क्रोध प्रकट करने के लिए विभिन्न हथकंडों को अपनाते है, किन्तु सरकार और प्रशासन यह बात बहुत अच्छी तरह मालूम है कि आम जनता की याद्दाश्त बहुत कमजोर है। जनता विरोध स्वरुप बस कुछ दिन तक हल्ला मचाती है फिर सब कुछ भूल कर अपनी-अपनी दिनचर्या में उलझ जाते हैं.इसी कारण से आज तक ना तो कभी सरकार और ना ही सुरक्षा तंत्र कोई सख्त कदम उठाना जरुरी समझता है।
ऐसे में एक सवाल जो हमेशा में मेरे मन में उठता रहा है कि:
समाज के वर्तमान दशा के लिए सिर्फ सरकार और प्रशासन को दोष देना उचित है?
क्या हम इन सब घटनाओं के लिए दोषी नहीं है?

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