Tuesday, 13 December 2011

ख़बर का असर नहीं तो मीडिया की कोई प्रासंगिकता नहीं‏


लोकतंत्र के जो अंग हैं उसमें मौजूदा समय में मीडिया की भूमिका अहम हो गई है। समय-समय पर बदलाव आते रहते हैं और जब लोकतंत्र की कोई एक संस्था शिथिल पड़ने लगती है तो दूसरे से उम्मीद जग जाती है। टेक्नोलॉजी, कम्युनिकेशंस और बदलाव की वजह से मीडिया का दायरा बढ़ गया है, इसकी गूंज हो गई है। जाहिर तौर पर इससे लोगों की उम्मीदें भी बढ़ गई हैं। शायद मीडिया का इतना महत्व, प्रभाव, उम्मीद और भूमिका पहले कभी नहीं रहा है। हां, आजादी के बाद एक-दो बार इस तरह की भूमिका में मीडिया जरूर आई।
अब मीडिया की भूमिका और उससे उम्मीदें बहुत बढ़ रही हैं। जन-सरोकार से जुड़े मुद्दों को आगे लाने, लोगों को उनके अधिकार के बारे में जानकारी देने में मीडिया की भूमिका बेहद अहम हो गई है। इससे मीडिया के सामने भी दो तरह की चुनौतियां सामने आई हैं। एक ओर इससे मीडिया की जवाबदेही बहुत बढ़ती जा रही है वहीं दूसरी ओर अन्य लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सुधार करने का दबाव भी बढ़ता जा रहा है। समय के साथ बदलाव का ही नतीजा है कि आज मीडिया वेब, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट के तीहरे प्रभाव के साथ हमारे सामने है। पहले आम लोग व्यवस्था से परेशान होकर न्यायपालिका की ओर जाते थे अब वे मीडिया की ओर पहले देखते हैं। इससे मीडिया को भी आत्ममंथन करने का मौका मिला है और यह दबाव भी बना है कि वह क्या कंटेंट दे रही है, क्या छाप रही है और क्या दिखा रही है? सुखद बात यह है कि इस पर एक आंकलन अंदरूनी और बाहरी दोनों तरफ से हो रहा है।
देश की आजादी के पहले मीडिया के पास आजादी का मिशन था। लेकिन उसके बाद भारत के निर्माण का मिशन हो गया कि मीडिया इसमें कितना सहयोग करती है। 60 के दशक से मीडिया में जवाबदही वाला समय आया। उम्मीदे बढ़ गईं थी, लोग अपना हक मांगने लगे थे और जागरूक होने लगे। यहां मीडिया के लिए एक नई शुरुआत हुई। इस दौरान, मीडिया पर अंकुश लगाने और उसकी भूमिका को सीमित करने के एक-दो प्रयास हुए लेकिन मीडिया ने इसका निर्भकता से मुकाबला किया और अपनी भूमिका निभाई। 80 के दशक में देश में न्यायिक सक्रियता की शुरुआत हुई तो उसके समानांतर ही मीडिया की सक्रियता की भी शुरुआत हुई। उस समय घोटालों को लेकर खोजी पत्रकारिता का दौर शुरू हुआ। मीडिया की सक्रियता को लेकर कई बार आलोचना भी हुई। लेकिन इसके बावजूद उसकी भूमिका बढ़ी है उससे उम्मीदें बढ़ी हैं साथ में अब जिम्मेदारी भी बढ़ी है।
अब समय काफी बदल गया है। अब सरोकारी न्यूज़ की जगह बढी है और यही हमसे अपेक्षित भी है। यह मीडिया की प्राथमिक भूमिका है और इसे वह भूल नहीं सकती। कुछ समय के लिए भले ही संक्रमण का दौर रहा हो लेकिन यह भी सत्य है कि आदमी वही देखना चाहता है जो उसके सरोकार की है। लिहाजा मीडिया आम सरोकार से हट नहीं सकता। हालांकि हमारी जिंदगी में सरोकार बढ़ गए हैं और उसे मनोरंजन भी चाहिए लेकिन रोटी-रोजी के बाद। मीडिया के लिए यह बेहद अहम हो गया है कि वह आम-लोगों से जुड़ी नीतियों के बारे में लोगों को जानकारी दे, एक समझ पैदा करे कि जो नीतियां हैं उसमें उसका क्या फायदा और घाटा है?
भ्रष्टाचार और जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाना और देश में सुरक्षा और शांति की भावना को लेकर लोगों में विश्वास पैदा करने के लिहाज से मीडिया की भूमिका बेहद अहम हो गई है। अब जमाना सरोकारी न्यूज़ का है।
मीडिया के सामने आज कई चुनौतियां हैं। किस ख़बर को तवज्जों देना है, यह अहम हो गया है। अगर ख़बर का असर नहीं है तो मीडिया की कोई प्रासंगिकता नहीं है और कोई भूमिका नहीं है। अगर खेल का असर होता है, एंटरटेनमेंट का असर होता है और आपके छापने और दिखाने का असर नहीं होता है तो आपकी प्रासंगिकता नहीं है। हालांकि अब प्रोफेशनलिज्म बढ़ा है लेकिन साथ में संभावनाएं भी बढ़ी हैं और न्यूज़ का दायरा भी बढ़ा है। मीडिया के सामने हमेशा से चुनौती रही है कि वह निर्भीक, स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से सरोकार का पक्ष रखे लेकिन अब यह चुनौती और बढ़ गई है। तंत्र जो भ्रष्ट हो रहा है उसे बचाना बड़ी चुनौती है। अगर तंत्र को भष्टाचार से बचा लें तो आधी समस्याओं का समाधान हो जाएगा।
‘मीडिया की दशा और दिशा’ की जहां तक बात है तो अगर आपकी दशा खराब होगी तो दिशा अपने आप खराब हो जाएगी। आपकी प्रासंगिकता ही दिशा है। एक बड़ी और अहम चुनौती और है भारतीय मीडिया के सामने। जिस तरह देश का विकास हो रहा है इसमें वो दिन दूर नहीं जब भारत के पास विश्व-स्तरीय मीडिया हाउस होगा और जिसका पूरी दुनिया में असर होगा। यह बड़ी चुनौती है कि आप सुपर पावर बनते हैं तो आपकी आवाज आपके मीडिया के जरिए दुनिया भर में सुनाई दे। और इसमें ‘आवाज’ से ज्यादा ‘असर’ होना चाहिए। भारतीय मीडिया के सामने विश्व-स्तरीय प्रभावशाली मीडिया हाउस बनाने की चुनौती भी है और जरूरत भी।

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