Friday, 16 December 2011

भारत में इंटरनेट की लत

 भारत में इस समय अधीरता से 'आकाश ' की प्रतीक्षा है।
'आकाश 'है स्कूली स्लेट जैसा वह टैबलेट कंप्यूटर, जो देश के 22 करोड़ छात्रों को इंटरनेट के आकाश पर पहुँचाने के लिए भारत-भूमि पर अवतरित हो रहा है।
केवल सवा दो हज़ार रूपए मूल्य वाले संसार के इस सबसे सस्ते टैबलेट पीसी से ऐसे शैक्षिक चमत्कारों की भविष्यवाणी की जा रही है, जो किसी और देश में अब तक नहीं हुए।
यह सोचने का कष्ट कोई नहीं करना चाहता कि हर बच्चे के हाथ में कंप्यूटर थमाने के क्या कोई दुष्परिणाम नहीं हो सकते? 

'आकाश' नवंबर के अंत से पहले बाज़ार में आने वाला है।
वह इंटरनेट के साथ-साथ फेसबुक, ट्विटर, मीडिया प्लेयर और कंप्यूटर गेम जैसी ऐसी कई सुविधाओं से लैस होगा, जो आजकल के युवाओं की पहली पसंद हैं।
उसके निर्माता शीघ्र ही हर महीने एक लाख 'आकाश' बेचने की आशा कर रहे हैं।
उसे सस्ता रखने और हर छात्र तक पहुँचाने में स्वयं भारत सरकार भी गहरी दिलचस्पी ले रही है।

इस में कोई शक नहीं किं कंप्यूटर का ज्ञान होना आज के समय की परम आवश्यकता है।
इंटरनेट हर तरह की सूचना और संवाद का सबसे तेज माध्यम बन गया है।
छात्र उससे अपने ज्ञान के क्षितिज का असीमित विस्तार कर सकते हैं।
पर, यह भी तो सच है कि इंटरनेट के माध्यम से बच्चों व छात्रों तक ऐसी अपार अवांछित बातें भी पहुंच सकती हैं, जो उन्हें भटका सकती हैं।
उनका चरित्र बिगाड़ सकती हैं।
जीवन बर्बाद कर सकती हैं।

टैबलेट ऐसा लघु कंप्यूटर है, जिसे किसी भी समय और किसी भी जगह इस्तेमाल किया जा सकता है।
माँ-बाप से छिपा कर उसका धड़ल्ले से दुरुपयोग भी हो सकता है।
इसकी क्या गारंटी कि स्कूली बच्चे उसका केवल अपनी पढ़ाई-लिखाई के लिए जानकारी जुटाने, ईमेल लिखने या फेसबुकी मित्रों से संपर्क करने के लिए ही उपयोग करेंगे?
वे मनचाहा संगीत ही नहीं, अश्लील तस्वीरें और वीडियो भी तो डाउनलोड कर सकते हैं?
उनका मन जितना इस तरह की चीजों में लगेगा, क्या उतना ही पढ़ाई-लिखाई में भी लगेगा?

Tuesday, 13 December 2011

प्यार भ्रम या सत्य.????

     प्यार लोगों का भ्रम मात्र है या सत्य ये लोगों  के लिए विवाद का विषय हो सकता है,
किन्तु अगर मेरी मानें तो प्यार एक मात्र भ्रम है इससे अधिक कुछ नहीं
यह केवल आलेख में नहीं अपितु मैंने अपने जीवन के खुद इस बात को महशुश (फील) किया है
हाँ सभी को इसका अलग-अलग ग़ुमां ज़रूर होता है।
कोई प्यार में बावरा हुआ जाता है कोई प्यार में खुद को तलाशता है। प्यार भी एक बार नहीं बार-बार होता है क्योंकि भ्रम जीवन में अनेकानेक बार होते ही हैं,या यूँ कह लें कि जीवन स्वयं ही भ्रम है तो भी कुछ अधिक न होगा। प्यार में जीने-मरने वाले भरे पड़े हैं और उन्हें आप गलत भी नहीं ठहरा सकते क्योंकि यही तो उनका भ्रम है और वो इससे ग्रसित। प्यार से बड़ा वायरस आज तक नहीं फैला जो दिखता तो नहीं लेकिन आपको कब डस लेता है आप समझ ही नहीं पाते। आप सही गलत सब प्यार की नज़र से देखते हैं और यही भ्रम आपको खोखला करता चला जाता है,पूरी तरह।
भ्रम हुआ,कि प्यार हुआ किंतु यही यदि दूसरे को नहीं हुआ तो भी मन दुखी और यदि हो गया तो फिर उसकी शिकायतों से दुखी। प्यार में यदि एक गुलाब भी मिला,दिल में पूरी क्यारी खिल जाती है और यदि नहीं तो बबूल के कांटे सीने पे बिछ जाते हैं। गज़ब का है ये भ्रम जो लोगों को कभी हँसाता-कभी रुलाता बल्कि एक कठपुतली सा नचाता है।
प्रेम रूपी वायरस पहले आपको मज़बूत बनाने का भ्रम दिखाता है फिर धीरे-धीरे आपको अपने अधीन कर कमज़ोर करता जाता है और आप फिर भी उसी भ्रम के पीछे भागते रहते हैं जिसका कोई अंत नहीं कोई वजूद नहीं।
 ‘प्यार बाँटते चलो’गाना सुनना अच्छा तो लगता है किंतु यथार्थ के धरातल पर सच्चाई से बहुत दूर क्योंकि किसी को भ्रमित करने से बेहतर होगा कि ‘ज़िंदगी जीते चलो’की तर्ज़ पर ही लोगों का हौसला बढ़ाया जाए




आधुनिक प्यार के ,
मायने बदल गए हैं,
प्यार अब निष्ठा विश्वास
का नाम नहीं,
प्यार अब दिल बहलाने का
झुनझुना बनकर रह गया है।



  • दीपक श्रीवास्तव.



(उपरोक्त आलेख स्वयं के अनुभवों पर आधारित है, यह किसी व्यक्ति विशेष को लक्ष्य बनाकर रचित नहीं है.)

अमर्यादित रिश्तों का सच‏


आज के वर्त्तमान परिदृश्य  में युवा वर्ग के बिच अमर्यादित रिश्तों क़ी चलन बहुत तेजी से बढ़ रही है.
अमर्यादित रिश्ते ना केवल रिश्तों को तार तार कर देते है बल्कि रिश्तों क़ी गरिमा और विश्वाश को भी खो देते है.
इस प्रकार क़ी अमर्यादित रिश्तों क़ी घटनाये आये दिन समाचारों में देखने एवं सुनने को मिलती रहतीं है,
जब हम इस प्रकार क़ी शर्मनाक घटनाएं अखबारों की सुर्खिओं में देखतें है तो मन घृणा और शर्म से भर जाता है और मन में बस एक ही ख्याल आता है क़ी आखिर आज के समाज में रिश्तों क़ी मर्यादा को लोग क्यों नहीं समझ रहे,?
आज समाज में ल़डका अपनी मौसी की बेटी को भगाकर ले जाता है, तो कहीं बहू ने अपने ससुर को पति बना लेती है,
कहीं दामाद सास के भागकर दूसरा विवाह कर लेता  है, तो कहीं भतीजा अपनी हमउम्र बुआ से ही विवाह कर लेता है.
जब इस प्रकार के अमर्यादित रिश्ते बनाए वालों से कारण जानने की कोसिस क़ी जाती है तो वे इसका कारण "प्यार" बताते है.
क्या सच में इस प्रकार क़ी घटनाये प्यार को दर्शाती है?
क्या प्यार में रिश्तों क़ी पवित्रता को बलि चढ़ाना उचित है? 
विसेश्ग्यों के अनुशार ऎसी घटनाएं जीवन में आई तीव्रता का परिणाम है और जब जिंदगी की ग़ाडी अति तीव्रता से चलती और बिना किसी नियम के चलती है तो दुर्घटना होने के अवसर उतने ही बढ़ जाते हैं। कई बार ऎसा भी होता है कि ल़डका या ल़डकी अपनी मौसा या चाची की ल़डकी और ल़डके में अपने भावी जीवनसाथी के गुण देखने लगते हैं। जिस कारण से उक्त ल़डका या ल़डकी उनके रोलमॉडल बन जाते हैं और वैसे ही गुण वाला इंसान या वही इंसान उनके दिलो-दिमाग में रच बस जाता है तो वो उसे पाने के लिए रिश्तों की मर्यादा को तो़डने से भी परहेज नहीं करते हैं, उन्हें लगने लगता है जब उन्हें यहीं सब कुछ मिल रहा है तो बाहर जाने की जरूरत ही नहीं है।

बेटे से बेहतर बेटी......‏

ऐश्वर्या राय बच्चन को बेटी होना बेटे से बेहतर है। इससे होगा यह कि बेटियों के पक्ष में थोड़ा-सा माहौल बनेगा और लोग लिंग परीक्षण से परहेज करेंगे। 


ऐश्वर्या चाहतीं तो शिशु का लिंग परीक्षण करा सकती थीं  और यह सुनिश्चित कर सकती थीं कि पहली संतान के रूप में उनके यहाँ बेटी नहीं हो क्योकि उनको सारी चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध थीं। किन्तु  उन्होंने न तो शिशु का लिंग परीक्षण कराया और न ही बेटी पैदा करने में झिझक दिखाई।

इससे बेटियों के पक्ष में थोड़ा-सा माहौल बनेगा और लोग लिंग परीक्षण से परहेज करेंगे। चाहे आपकी नीयत लड़का-लड़की में भेद करने की नहीं हो, पर यदि आप लिंग परीक्षण करा लेते हैं, तो उस रोमांच से वंचित हो जाते हैं जो सौर ग्रह से खबर के रूप में आता है (Which announce by Nurse )। उस रोमांच का, उस एक पल का मजा वही जानते हैं जो पिता या दादा-दादी, नाना-नानी बने हैं। 

ऐश्वर्या को बेटा होता तो बहुत लोगों में यह संदेश जाता कि ऐश्वर्या राय के गर्भ धारण की खबरें पहले भी आती रही हैं। पहले गर्भ में बेटियाँ रही होंगी सो अबॉर्शन कराती रहीं और अब बेटा पेट में आया तो उसे जन्म दे दिया। समाज का एक अधपढ़ा वर्ग तो जरूर ऐसा है, जिसके मन में इस तरह की बातें उठतीं।

फिर इसका परिणाम यह होता कि उस वर्ग की बहुत-सी महिलाएँ गर्भ में बेटियों को मरवातीं और सोचतीं कि जब ऐश्वर्या ऐसा कर सकती हैं, तो वे क्यों नहीं। अमिताभ भी एक मंच पर पोते की ख्वाहिश जाहिर कर चुके थे, सो सबको यही शक होता कि ऐश्वर्या ने चुनकर, सोच-समझकर और तरकीबें लगाकर बेटा पैदा किया है। मगर कुदरत ने जो किया बहुत अच्छा किया। 

अभिषेक-ऐश्वर्या का सम्मान लोगों के मन में और बढ़ गया है कि उन्होंने बेटी पैदा की। अमिताभ दादा बने हैं, खुशी की बात है। पर इससे भी ज्यादा खुशी इस बात की है कि उन्हें पोता नहीं पोती हुई है। लक्ष्मी और सरस्वती से भरे पूरे घर में साक्षात लक्ष्मी आई है। सरस्वती की भी इस पर उतनी ही कृपा हो, जितनी अमिताभ पर है। अमिताभ की पोती इस मामले में तो बहुत ही खुशनसीब है कि पूरा देश उसे दुआएँ दे रहा है

ख़बर का असर नहीं तो मीडिया की कोई प्रासंगिकता नहीं‏


लोकतंत्र के जो अंग हैं उसमें मौजूदा समय में मीडिया की भूमिका अहम हो गई है। समय-समय पर बदलाव आते रहते हैं और जब लोकतंत्र की कोई एक संस्था शिथिल पड़ने लगती है तो दूसरे से उम्मीद जग जाती है। टेक्नोलॉजी, कम्युनिकेशंस और बदलाव की वजह से मीडिया का दायरा बढ़ गया है, इसकी गूंज हो गई है। जाहिर तौर पर इससे लोगों की उम्मीदें भी बढ़ गई हैं। शायद मीडिया का इतना महत्व, प्रभाव, उम्मीद और भूमिका पहले कभी नहीं रहा है। हां, आजादी के बाद एक-दो बार इस तरह की भूमिका में मीडिया जरूर आई।
अब मीडिया की भूमिका और उससे उम्मीदें बहुत बढ़ रही हैं। जन-सरोकार से जुड़े मुद्दों को आगे लाने, लोगों को उनके अधिकार के बारे में जानकारी देने में मीडिया की भूमिका बेहद अहम हो गई है। इससे मीडिया के सामने भी दो तरह की चुनौतियां सामने आई हैं। एक ओर इससे मीडिया की जवाबदेही बहुत बढ़ती जा रही है वहीं दूसरी ओर अन्य लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सुधार करने का दबाव भी बढ़ता जा रहा है। समय के साथ बदलाव का ही नतीजा है कि आज मीडिया वेब, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट के तीहरे प्रभाव के साथ हमारे सामने है। पहले आम लोग व्यवस्था से परेशान होकर न्यायपालिका की ओर जाते थे अब वे मीडिया की ओर पहले देखते हैं। इससे मीडिया को भी आत्ममंथन करने का मौका मिला है और यह दबाव भी बना है कि वह क्या कंटेंट दे रही है, क्या छाप रही है और क्या दिखा रही है? सुखद बात यह है कि इस पर एक आंकलन अंदरूनी और बाहरी दोनों तरफ से हो रहा है।
देश की आजादी के पहले मीडिया के पास आजादी का मिशन था। लेकिन उसके बाद भारत के निर्माण का मिशन हो गया कि मीडिया इसमें कितना सहयोग करती है। 60 के दशक से मीडिया में जवाबदही वाला समय आया। उम्मीदे बढ़ गईं थी, लोग अपना हक मांगने लगे थे और जागरूक होने लगे। यहां मीडिया के लिए एक नई शुरुआत हुई। इस दौरान, मीडिया पर अंकुश लगाने और उसकी भूमिका को सीमित करने के एक-दो प्रयास हुए लेकिन मीडिया ने इसका निर्भकता से मुकाबला किया और अपनी भूमिका निभाई। 80 के दशक में देश में न्यायिक सक्रियता की शुरुआत हुई तो उसके समानांतर ही मीडिया की सक्रियता की भी शुरुआत हुई। उस समय घोटालों को लेकर खोजी पत्रकारिता का दौर शुरू हुआ। मीडिया की सक्रियता को लेकर कई बार आलोचना भी हुई। लेकिन इसके बावजूद उसकी भूमिका बढ़ी है उससे उम्मीदें बढ़ी हैं साथ में अब जिम्मेदारी भी बढ़ी है।
अब समय काफी बदल गया है। अब सरोकारी न्यूज़ की जगह बढी है और यही हमसे अपेक्षित भी है। यह मीडिया की प्राथमिक भूमिका है और इसे वह भूल नहीं सकती। कुछ समय के लिए भले ही संक्रमण का दौर रहा हो लेकिन यह भी सत्य है कि आदमी वही देखना चाहता है जो उसके सरोकार की है। लिहाजा मीडिया आम सरोकार से हट नहीं सकता। हालांकि हमारी जिंदगी में सरोकार बढ़ गए हैं और उसे मनोरंजन भी चाहिए लेकिन रोटी-रोजी के बाद। मीडिया के लिए यह बेहद अहम हो गया है कि वह आम-लोगों से जुड़ी नीतियों के बारे में लोगों को जानकारी दे, एक समझ पैदा करे कि जो नीतियां हैं उसमें उसका क्या फायदा और घाटा है?
भ्रष्टाचार और जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाना और देश में सुरक्षा और शांति की भावना को लेकर लोगों में विश्वास पैदा करने के लिहाज से मीडिया की भूमिका बेहद अहम हो गई है। अब जमाना सरोकारी न्यूज़ का है।
मीडिया के सामने आज कई चुनौतियां हैं। किस ख़बर को तवज्जों देना है, यह अहम हो गया है। अगर ख़बर का असर नहीं है तो मीडिया की कोई प्रासंगिकता नहीं है और कोई भूमिका नहीं है। अगर खेल का असर होता है, एंटरटेनमेंट का असर होता है और आपके छापने और दिखाने का असर नहीं होता है तो आपकी प्रासंगिकता नहीं है। हालांकि अब प्रोफेशनलिज्म बढ़ा है लेकिन साथ में संभावनाएं भी बढ़ी हैं और न्यूज़ का दायरा भी बढ़ा है। मीडिया के सामने हमेशा से चुनौती रही है कि वह निर्भीक, स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से सरोकार का पक्ष रखे लेकिन अब यह चुनौती और बढ़ गई है। तंत्र जो भ्रष्ट हो रहा है उसे बचाना बड़ी चुनौती है। अगर तंत्र को भष्टाचार से बचा लें तो आधी समस्याओं का समाधान हो जाएगा।
‘मीडिया की दशा और दिशा’ की जहां तक बात है तो अगर आपकी दशा खराब होगी तो दिशा अपने आप खराब हो जाएगी। आपकी प्रासंगिकता ही दिशा है। एक बड़ी और अहम चुनौती और है भारतीय मीडिया के सामने। जिस तरह देश का विकास हो रहा है इसमें वो दिन दूर नहीं जब भारत के पास विश्व-स्तरीय मीडिया हाउस होगा और जिसका पूरी दुनिया में असर होगा। यह बड़ी चुनौती है कि आप सुपर पावर बनते हैं तो आपकी आवाज आपके मीडिया के जरिए दुनिया भर में सुनाई दे। और इसमें ‘आवाज’ से ज्यादा ‘असर’ होना चाहिए। भारतीय मीडिया के सामने विश्व-स्तरीय प्रभावशाली मीडिया हाउस बनाने की चुनौती भी है और जरूरत भी।

औन स्क्रीन वर्किंग की थकान दूर करने के आसान उपाय


हाथों और उन्गलिओं के थकान दूर करने के उपाय:
कुर्सी पर बैठे-बैठे ही अपने हाथों को सामने की ओर कंधे के बराबर ले जाकर हथेलीओं को नीचे की ओर रखते हुए मुठ्ठी बना लें। 
हाथ के अंगूठा को अंदर की ओर रखें,
अब दोनों हथेलियों को घुमाइएं (क्रमशः वामावर्त एवं दक्षिणावर्त)।
दोनों हथेलियों को दोनों दिशाओं में बारी-बारी से घुमाएं।
सांस सामान्य रखें।
आँखों के थकान दूर करने के उपाय:
अपने हथेलीओं को आपस में रगड़ें और आंखों को बंद कर हथेलियों को आंखों पर रखे।
उसके बाद आंखों के  आई बाल्स को गोल-गोल घुमाए।
तत्पश्चात आंखे बंद कर गहरी सांस लें
अगर आप औन स्क्रीन वर्किंग के दौरान इसे थोड़ी थोड़ी देर पर इसे करते रहें तो आपके  हाथों, अंगुलियों और आँखों का तनाव कम हो जायेगा.

("यह आलेख सिर्फ व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित है, इसका चिकित्साविज्ञान से कोई संबंध नहीं है.")

घरेलु बाज़ार में विदेशी निवेश कितना उचित


भारत में दूकान और घरेलु रोजगार धंधो को पूर्णतया बर्बाद करने आ रही है एक और अमेरिकी कंपनी ...वाल मार्ट 
सभी दुकान वालो और लघु उद्योग वालो को मिलकर इस लुटेरी कंपनी का विरोध करना चाहिए ... सरकार ने इन्हें ५१ % निवेश की अनुमति दी है ....

मनमोहन सिंह जी से प्रश्न पुचाते है की ऐसी भी क्या मज़बूरी आन पड़ी ?
क्या सोनिया अमेरिका में यही इलाज करवा रही थी ?

आपको बता दे की क्रेडिट कार्ड संस्कृति के कारन वालमार्ट का धंधा अमेरिका में मंदा चल रहा है, या बर्बाद होने की कगार तक पहुँच गया है और जैसा की सारी दुनिया का कचरा लाने की भारतीय मानसिकता का पालन करते हुए पिचले ४ वर्षो में 38 अमेरिकी कम्पनियाँ जो मंदी के कारण बर्बाद होने की कगार पर पहुँच गई थी सभी भारत में है और यहाँ मजे से व्यापार कर रही है (कारण आपको भी पता होगा) ....

आपने कभी देखा होगा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ओबामा के साथ बहुत प्रसन्न मुद्रा में ... इसका राज क्या है ?

सवाल है की हमारे क्रांतिकारियों ने क्यूँ अपनी जान दी ?
क्यूँ वे शहीद हुए ? किसलिए ? 

कितना गजब का संयोग है भारत में
टीवी कार्यक्रमों में वेश्याये आ रही है ... उसके जरिये
युवाओं को नाग्नातावाद की तरफ खिंचा जा रहा है ...
फिल्मो में अब भारतीय परिधानों की जगह चड्डी बनियानो (मॉडर्न नाम "बिकनी") ने ले ली है
मीडिया में अब खबरों की जगह फूहड़ता और बकवास ने ले ली है ...
युवाओं में अब भारतीय करण की जगह पश्चिमीकरण फैलता जा रहा है ...
हिजड़ो की शादियों के लिए रेलिया की जा रही है ..
भगवे पर चर्च पोषित मीडिया के हमले जारी है ... 
पाकिस्तान से हिन्दुओं का पलायन जारी है ...
भारत में हिन्दुओं का शोषण जारी है
देश में दिन ब दिन अरबो के घोटाले आ रहे है ...
बाबर जैसे अत्याचारी आतंकी की मस्जिद के लिए 
आन्दोलन होते है राम के देश में राम का मंदिर नहीं बन सकता 
गौ कट रही है उसका मांस बेचा जा रहा है.
सरकार काले धन पर मूक चुप बैठी है ...
बाजारवाद और ग्लोबलाइजेशन के नाम पर हम अपनी संस्कृति और बचे खुचे घरेलु रोजगार धंधे भी बर्बाद करने पर तुले है

क्या होगा इस देश का ? ? ?