Friday, 3 February 2012

तकनिकी महाविद्यालयों में व्यापत भ्रष्टाचार

दोस्तों,
तकनिकी महाविद्यालयों का वर्त्तमान स्वरुप सर्वविदित है, और उनमे व्यापत  भ्रष्टाचार भी किसी से छुपी नहीं है.
हम निम्न बिन्दुओं के ध्यान में रखकर इसका अवलोकन करेंगे"
  1. ए.आई.सी.ई.टी के अनुदेशों का पालन.
  2. विश्वविद्यालय ने नियमों का पालन.
  3. विज्ञापनों में उल्लेखित शुविधाओं की उपलब्धता.
  4. महाविद्यालय में व्यापत राजनीती/चुगली.
तो शुरुआत करतें है  ए.आई.सी.ई.टी (A.I.C.E.T) के अनुदेशों के पालन से,
         ए.आई.सी.ई.टी  ने प्राध्यापक एवं छात्र  का रेसिओ निर्धारित कर रखा है और प्राध्यापकों का वेतन निर्धारण भी उनके पद के अनुसार की जानी होती है किन्तु  प्राध्यापकों अवाम अन्य कर्मचारिओं को  निर्धारित वेतन से  काफी कम दी जाती है और हस्ताक्षर उतनी ही सेलरी पर करवाते है जितनी ऐ.आई.सी.टी. के नियम के अनुसार है , कर्मचारी कि मजबूरी है जॉब करना घर जो पलना है बेचारे को.तकनिकी महाविद्यालय द्वारा फर्जी बायोडाटा , और कागज दिखाकर A.I.C.E.T  कि आँखों में धुल झोंका जाता है.
ऐसे कर्मचारियों क़ा व्योरा और दस्तावेज दिखाते है जो उस महाविद्यालय में काम ही नहीं करता,
हो सकता है आपका अगला सवाल हो की आखिर ये दस्तावेज लटें कहा से है?
जब ये लोग अपने यहाँ शिक्षकों को नियोजित करते है और उन्हें साक्षात्कार के लिए बुलाते है तो तो उनके दस्तावेजों  कि क्षाया प्रति मसाक्षात्कार के समय पर मंगाते है. अब जिनको ये चयनित करतें है उनको तो जॉब देते है, और जिनको नहीं करते उनके दस्तावेज रख लेते है और उनसे कहते है कि अभी आप वेटिंग में हो. जब कभी निरिक्षण  क़ा समय होता है तो महाविद्यालय द्वारा उन्ही दस्तावेजों को दिखा दिया जाता है.

    
तकनिकी महाविद्यालयों द्वारा छात्रों को प्रवेश के समय विज्ञापनों के द्वारा  अपने कोलिजो में ऐसी शुविधाये दिखाते है विज्ञापन में जो इन कोलिजो में कभी होती ही नहीं है.
  इतना ही नहीं, छात्रों के प्लेसमेंट
 समय पर कुछमाहविद्यालय तो फर्जी कंपनी बुलाकर फर्जी प्लेसमेंट करवा देते है, जिससे छात्रों ये ना लगे कि कॉलेज में कंपनी नहीं आई, लेकिन जब इनकी ज्वायनिंग क़ा समय आता है तब छात्रों को असलियत क़ा पता चतला है किन्तु तब तक वो कॉलेज से पास हो चुकें होतें है.
 
  अब आतें है तकनिकी महाविद्यालयों में व्याप्त तथाकथित राजनीती/चुगली के मुद्दे पर,
आज कल इन महाविद्यालयों में जो कार्यरत कर्मचारी और अध्यापकों में से कुछ माहौल को बिलकुल बिगाड़ कर रख देते है , जैसे की वो नये अध्यापक को किसी ना किसी माममले में फंसाकर निकलवाने की कोशिश , या फिर उनका इतना शोषण करते है कि वो बेचारा खुद ही नौकरी छोड़कर चला ज़ाता है.कुछ अध्यापक तो कक्षाओं में भी छात्रों को पढाने में भी रूचि नहीं दिखाते और उनको "इन्टरनल मार्क्स" देकर खुश कर देते है जिससे कि छात्र कोई शिकायत ना करे.  जब कोई छात्र शिकायत करता है तो "इन्टरनल मार्क्स" कि धमकी शिक्षक और महाविद्यालय द्वारा दी जाती है.   कुछ लोग संस्था में  चापलूसी का माहौल बना देते , वो अपना काम सही से नहीं कर पते वे महाविद्यालय के प्राचार्य/निदेशक कि चापलूसी करते है और दूसरो कि चुगली करते है ताकि वो खुद कि नौकरी बचा सके.    अब बात करते है कि क़ी किस तरह से निदेशक और चेयरमैन कर्मचारियों क़ा शोषण करते है, जैसे क़ी इन तथाकथित महाविद्यालयों में देखा ज़ाता है क़ी जब कमर्चारी के वेतन वृद्धिक़ी बात आती है ये उसको भरा क़ा रास्ता दिखा देते है या फिर इतना मानशिक उत्पीडन करते है क़ी वो खुद नौकरी छोड़कर चला जाये. जब कोई कर्मचारी अपनी कोई समस्या लेकर  निदेशक और चेयरमैन के पास जाता है तो ये कहते है क़ी आप कही और जॉब देख लीजये. वेतन भुगतान के सम्बन्ध में जहा तक मेरी जानकारी है,  सभी कर्मचारिओं को महीने क़ी वेतन अगले महीने क़ी 10  तारीख तक हर हाल में उसको मिल जानी चाहिए . पर ये लोग अगले महीने क़ी 25  तारीख के बाद ही देते है.

(विशेष: शुधि पाठकों से अनुरोध है की वे इस आलेख को विवाद का विषय न बनाये. क्योकि ये मेरा स्वयं का विचार है किन्तु कुछ महाविद्यालयों के सम्बन्ध में ये सत्य भी है जो समय समय पर समाचारों के माध्यम से लोगों तक पहुचते रहता है.)

Wednesday, 25 January 2012

रखैल व्यवस्था का आधुनिक रूप "Live in Relationship"

दोस्तों,
हो सकता है की "Live in Relationship" के बारे में आप लोगों के विचार अलग-अलग हो किन्तु मेरी मने तो ये "रखैल व्यवस्था" का ही आधुनिक रूप है.
आज कल के युवा पीढ़ी इस गैर सामाजिक संबंधों के प्रति अत्याधिक आकर्षित दिखाई दे रही है. उनका तर्क होता है कि विवाह के बंधन में बंधने से पहले एक-दूसरे को अच्छी तरह से समझ लिया जाए तो वैवाहिक जीवन में सामंजस्य बैठा पाना आसान हो जाता है. समाज द्वारा महिला और पुरुष को विवाह से पहले साथ रहने की इजाजत  न होने के बावजूद युवा लिव इन में जाने से बिलकुल नहीं हिचकिचाते.कुछ लोग मानना है कि यह प्रथा भारतीय समाज में प्राचीन समय से "रखैल"  के स्वरूप में व्याप्त है किन्तु वो यह भूल जाते हैं, कि दोनों मे कितना अन्तर है। साधारण भाषा में रखैल को रक्खा जाता था जिसमे पुरुष की इच्छा सर्वोपरि होती थी स्त्री मजबूरी बस या जर्बजस्ती मे रहती थी ।  उसे पत्नी की हैंसियत भी नही मिलती थी। स्त्री स्वेच्छा से किसी की रखैल बनना स्वीकार नही करती थी। दूसरे तरफ "लिव इन" मे स्त्री स्वेच्छा से रहना स्वीकार करती है और उसे वो विचारों की आधुनिकता और स्वतन्त्रता कहती है। युवा पीढी भट्क गयी है, या नही ये तो हम नही कह सकते परन्तु जो भी इन सम्बन्धों को सहमति देता है, उसकी सोच अवश्य भारतीय संस्कृत के विपरीत है।
आप "  लिव इन रिलेशनशिप " की वकालत करने वालों से यह प्रश्न पुछ सकतें है की:
१. क्या  "लिव इन रिलेशनशिप " विवाह की गारंटी लेता है?
आज कल  लिव इन के टूटने और प्रेमी के धोखा देने के बाद सुसाइड  जैसी घटनाये दिन प्रतिदिन बढती जा रही है, लिव इन के टूटने के बाद   दुनियां के तानों से बचने के लिए स्त्री के पास "आत्महत्या" के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता.
भारतीय संस्कृति की गरिमा दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है, जिस भारत में लोग रिश्ते निभाने एवंम मूल्यों को मानने में अपने स्वार्थ की बलि दे देते हैं। जहां नदियों को माँ माना जाता हो, जहां पति को परमेश्वर का दर्जा दिया जाता हो,उसी भारत मे आज विवाह जैसी संस्था को हमारी युवा पीढी अस्वीकार करने लगी है, और लिव इन जैसी रिश्ते को स्वीकार करने लगी है ।उसके पीछे तर्क ये है, कि इसमे कोई बन्धन नही है । जब तक मन मिले तब तक रहो वरना अपना-अपना रास्ता नापो।आज हम अधिकार तो चाहते हैं। लेकिन कर्त्तव्य नही निभाना चाहते हैं। रिश्ते तो चाहते हैं।
परतुं जिम्मेदारियाँ नहीं चाहते इसलिए हम पश्चिमीसभ्यता के अधांनुकरण के फलस्वरूप लिव इन जैसे रिश्ते को स्वीकारने लगे हैं।"लिव इन रिलेशनशिप" की आड़ में वासनात्रप्ती की खुले आम स्वीकारोक्ती है। पति-पत्नी के रिश्ते से विभिन्न रिश्तों का स्रृजन होता है, वहीं लिव इन रिश्ते अपना ही स्थायित्व नही जानते। 
यह कहना कदापि गलत नहीं होगा कि महिलाओं के शोषण का नया दौर शुरू चुका है और अपनी आंखों पर आधुनिकता की पट्टी  बांधे युवक/युवतियां इस बात को सोचना तो दूर, सुनना भी पसंद नहीं करते, और इस प्रकार के अमर्यादित रिश्तों को बेहिच अपना रहे है।

Wednesday, 18 January 2012

प्रेम-विवाह के अंजाम

दोस्तों,
हमलोग प्रतिदिन अपने आस- पास ऐसे ढेरों लवर्स को देखतें है जो एक-दूसरे से प्रेम करने का दंभ तो भरते हैं और साथ जीने मरने की नित नए कशमें खातें है. लेकिन वे यह भी भली-भांति जानते हैं कि उनकी पसंद उनके अभिभावकों को किसी भी रूप में पसंद नहीं आएगी. इसके पीछे अभिभावकों की रुढ़िवादी मानसिकता या अलग-अलग जाति या धर्म का होना एक बड़ा कारण बनते हैं.
कभी कभी में इन 
लवर्स को देखकर यह सोचने पर मजबुर हो जाता हूँ की क्या परिवार वालों से लड़-झगड़ कर या उन्हें मजबूर कर प्रेम विवाह कर खुशाल जिंदगी जिया जा सकता है?
अक्शर ये देखने में आता है की 
लड़का, लड़की के स्वभाव और अपने परिवार की पसंद को बहुत अच्छी तरह समझता है और ये जानते हुए कि लड़की कभी भी उसके परिवार के अनुसार खुद को ढाल नहीं पाएगी, अपने अभिभावकों को राजी करवाने की पूरी-पूरी कोशिश करतें है.
अगर इस तरह के प्रेमी युगल अगर विवाह के बंधन में बंध भी 
जाते हैं तो उनके प्रेमपूर्वक रहने की संभावना बहुत कम या ना के बराबर ही होती हैं.
हमारे समाज में 
विवाह के पश्चात बेटी को अपने पिता का घर छोड़कर पति के घर जाना होता है. ऐसे में अगर वह लड़की प्रेम विवाह करने जा रही हैं तो निश्चित है कि वह लड़के के स्वभाव और आर्थिक स्थिति से पूरी तरह आशवस्त होने के बाद ही विवाह करने का निर्णय लेती है. अगर माता-पिता इस रिश्ते से राजी ना भी हो तो भी वह थोड़े मनमुटाव के बाद बेटी की खुशी के लिए इस रिश्ते को मंजूरी दे देते हैं. उन्हें लगता है कि अगर लड़का उसे शादी के बाद खुश रखेगा तो इसमें कोई परेशानी नहीं है.
किन्तु लड़कों के साथ ऐसा नहीं है, विवाहोपरान्त
 लड़का अपनी पत्नी के साथ अपने अभिभावकों के साथ रहता है. अगर उसके अभिभावकों को यह लड़की पसंद ना हुई या किसी कारण वश उन्होंने पूरी आत्मीयता के साथ अपनी वधु को स्वीकार नहीं किया तो निश्चित है परिवार में हर समय कलह या मनमुटाव का वातावरण बना रहता है, लड़की को भले ही ज्यादा परेशान ना किया जाये किन्तु उस परिवार का बेटा अपनी पत्नी और माता-पिता के बीच के लड़ाई-झगड़ों में अपने आप को बुरी तरह उलझा हुआ पता है. वह ना तो उस लड़की (पूर्व प्रेमिका जो अब पत्नी है) को कुछ कह सकता है और ना ही अभिभावकों के साथ अपनी समस्या बयां कर सकता है.प्रेम-विवाह में सामान्यतः ये देखने को मिलता है की पत्नियां अपने पति पर पूरी तरह हावी हो जाती हैं, उन्हें वैवाहिक जीवन को निभाना अपनी जिम्मेदारी की जगह पति की मजबूरी लगने लगता है.
इस प्रेम विवाह में
 पत्निओं को लगता है कि उनके प्रेमी ने उनसे इसीलिए विवाह किया है, की वो उनके बिना नहीं रह सकतें.इस प्रकार के विचारों से घर में कलह ज्यादा बढ़ जाती है और खुद को मनचाही स्वतंत्रता ना मिलने पर वह पति को अलग होने के लिए कहती हैं और बिगड़ते हालातों को संभालने के लिए बेटे को अपने परिवार से अलग होना ही पड़ता है.
आज-कल के लवर्स प्रेम संबंध को प्रेम विवाह विवाह में तब्दील करे की कोशिश करतें तो है किन्तु उन्हें ये नहीं पता होता की प्रेम संबंध निभाना उतना जटिल कार्य नहीं होता जितना एक गलत जीवनसाथी के साथ "प्रेम विवाह" करने के पश्चात वैवाहिक जीवन बिताना.अभिभावक अपने बच्चों के खुशी के लिए अपनी जरूरतें तक त्याग देये हैं. किन्तु उस बच्चे का एक गलत कदम उन्हें जीवन भर के लिए दुख दे जाता है. ऐसे हालातों को देखते हुए यह कहना कदापि गलत नहीं होगा कि प्रेम-विवाह करने के बाद अगर किसी को नुकसान होता है तो वह मात्र उस लड़के को जिसने परिवार वालों की मर्जी और इच्छाओं को पीछे छोड़ दिया.

Friday, 16 December 2011

भारत में इंटरनेट की लत

 भारत में इस समय अधीरता से 'आकाश ' की प्रतीक्षा है।
'आकाश 'है स्कूली स्लेट जैसा वह टैबलेट कंप्यूटर, जो देश के 22 करोड़ छात्रों को इंटरनेट के आकाश पर पहुँचाने के लिए भारत-भूमि पर अवतरित हो रहा है।
केवल सवा दो हज़ार रूपए मूल्य वाले संसार के इस सबसे सस्ते टैबलेट पीसी से ऐसे शैक्षिक चमत्कारों की भविष्यवाणी की जा रही है, जो किसी और देश में अब तक नहीं हुए।
यह सोचने का कष्ट कोई नहीं करना चाहता कि हर बच्चे के हाथ में कंप्यूटर थमाने के क्या कोई दुष्परिणाम नहीं हो सकते? 

'आकाश' नवंबर के अंत से पहले बाज़ार में आने वाला है।
वह इंटरनेट के साथ-साथ फेसबुक, ट्विटर, मीडिया प्लेयर और कंप्यूटर गेम जैसी ऐसी कई सुविधाओं से लैस होगा, जो आजकल के युवाओं की पहली पसंद हैं।
उसके निर्माता शीघ्र ही हर महीने एक लाख 'आकाश' बेचने की आशा कर रहे हैं।
उसे सस्ता रखने और हर छात्र तक पहुँचाने में स्वयं भारत सरकार भी गहरी दिलचस्पी ले रही है।

इस में कोई शक नहीं किं कंप्यूटर का ज्ञान होना आज के समय की परम आवश्यकता है।
इंटरनेट हर तरह की सूचना और संवाद का सबसे तेज माध्यम बन गया है।
छात्र उससे अपने ज्ञान के क्षितिज का असीमित विस्तार कर सकते हैं।
पर, यह भी तो सच है कि इंटरनेट के माध्यम से बच्चों व छात्रों तक ऐसी अपार अवांछित बातें भी पहुंच सकती हैं, जो उन्हें भटका सकती हैं।
उनका चरित्र बिगाड़ सकती हैं।
जीवन बर्बाद कर सकती हैं।

टैबलेट ऐसा लघु कंप्यूटर है, जिसे किसी भी समय और किसी भी जगह इस्तेमाल किया जा सकता है।
माँ-बाप से छिपा कर उसका धड़ल्ले से दुरुपयोग भी हो सकता है।
इसकी क्या गारंटी कि स्कूली बच्चे उसका केवल अपनी पढ़ाई-लिखाई के लिए जानकारी जुटाने, ईमेल लिखने या फेसबुकी मित्रों से संपर्क करने के लिए ही उपयोग करेंगे?
वे मनचाहा संगीत ही नहीं, अश्लील तस्वीरें और वीडियो भी तो डाउनलोड कर सकते हैं?
उनका मन जितना इस तरह की चीजों में लगेगा, क्या उतना ही पढ़ाई-लिखाई में भी लगेगा?

Tuesday, 13 December 2011

प्यार भ्रम या सत्य.????

     प्यार लोगों का भ्रम मात्र है या सत्य ये लोगों  के लिए विवाद का विषय हो सकता है,
किन्तु अगर मेरी मानें तो प्यार एक मात्र भ्रम है इससे अधिक कुछ नहीं।
यह केवल आलेख में नहीं अपितु मैंने अपने जीवन के खुद इस बात को महशुश (फील) किया है।
हाँ सभी को इसका अलग-अलग ग़ुमां ज़रूर होता है।
कोई प्यार में बावरा हुआ जाता है कोई प्यार में खुद को तलाशता है। प्यार भी एक बार नहीं बार-बार होता है क्योंकि भ्रम जीवन में अनेकानेक बार होते ही हैं,या यूँ कह लें कि जीवन स्वयं ही भ्रम है तो भी कुछ अधिक न होगा। प्यार में जीने-मरने वाले भरे पड़े हैं और उन्हें आप गलत भी नहीं ठहरा सकते क्योंकि यही तो उनका भ्रम है और वो इससे ग्रसित। प्यार से बड़ा वायरस आज तक नहीं फैला जो दिखता तो नहीं लेकिन आपको कब डस लेता है आप समझ ही नहीं पाते। आप सही गलत सब प्यार की नज़र से देखते हैं और यही भ्रम आपको खोखला करता चला जाता है,पूरी तरह।
भ्रम हुआ,कि प्यार हुआ किंतु यही यदि दूसरे को नहीं हुआ तो भी मन दुखी और यदि हो गया तो फिर उसकी शिकायतों से दुखी। प्यार में यदि एक गुलाब भी मिला,दिल में पूरी क्यारी खिल जाती है और यदि नहीं तो बबूल के कांटे सीने पे बिछ जाते हैं। गज़ब का है ये भ्रम जो लोगों को कभी हँसाता-कभी रुलाता बल्कि एक कठपुतली सा नचाता है।
प्रेम रूपी वायरस पहले आपको मज़बूत बनाने का भ्रम दिखाता है फिर धीरे-धीरे आपको अपने अधीन कर कमज़ोर करता जाता है और आप फिर भी उसी भ्रम के पीछे भागते रहते हैं जिसका कोई अंत नहीं कोई वजूद नहीं।
 ‘प्यार बाँटते चलो’गाना सुनना अच्छा तो लगता है किंतु यथार्थ के धरातल पर सच्चाई से बहुत दूर क्योंकि किसी को भ्रमित करने से बेहतर होगा कि ‘ज़िंदगी जीते चलो’की तर्ज़ पर ही लोगों का हौसला बढ़ाया जाए।




आधुनिक प्यार के ,
मायने बदल गए हैं,
प्यार अब निष्ठा विश्वास
का नाम नहीं,
प्यार अब दिल बहलाने का
झुनझुना बनकर रह गया है।



  • दीपक श्रीवास्तव.



(उपरोक्त आलेख स्वयं के अनुभवों पर आधारित है, यह किसी व्यक्ति विशेष को लक्ष्य बनाकर रचित नहीं है.)

अमर्यादित रिश्तों का सच‏


आज के वर्त्तमान परिदृश्य  में युवा वर्ग के बिच अमर्यादित रिश्तों क़ी चलन बहुत तेजी से बढ़ रही है.
अमर्यादित रिश्ते ना केवल रिश्तों को तार तार कर देते है बल्कि रिश्तों क़ी गरिमा और विश्वाश को भी खो देते है.
इस प्रकार क़ी अमर्यादित रिश्तों क़ी घटनाये आये दिन समाचारों में देखने एवं सुनने को मिलती रहतीं है,
जब हम इस प्रकार क़ी शर्मनाक घटनाएं अखबारों की सुर्खिओं में देखतें है तो मन घृणा और शर्म से भर जाता है और मन में बस एक ही ख्याल आता है क़ी आखिर आज के समाज में रिश्तों क़ी मर्यादा को लोग क्यों नहीं समझ रहे,?
आज समाज में ल़डका अपनी मौसी की बेटी को भगाकर ले जाता है, तो कहीं बहू ने अपने ससुर को पति बना लेती है,
कहीं दामाद सास के भागकर दूसरा विवाह कर लेता  है, तो कहीं भतीजा अपनी हमउम्र बुआ से ही विवाह कर लेता है.
जब इस प्रकार के अमर्यादित रिश्ते बनाए वालों से कारण जानने की कोसिस क़ी जाती है तो वे इसका कारण "प्यार" बताते है.
क्या सच में इस प्रकार क़ी घटनाये प्यार को दर्शाती है?
क्या प्यार में रिश्तों क़ी पवित्रता को बलि चढ़ाना उचित है? 
विसेश्ग्यों के अनुशार ऎसी घटनाएं जीवन में आई तीव्रता का परिणाम है और जब जिंदगी की ग़ाडी अति तीव्रता से चलती और बिना किसी नियम के चलती है तो दुर्घटना होने के अवसर उतने ही बढ़ जाते हैं। कई बार ऎसा भी होता है कि ल़डका या ल़डकी अपनी मौसा या चाची की ल़डकी और ल़डके में अपने भावी जीवनसाथी के गुण देखने लगते हैं। जिस कारण से उक्त ल़डका या ल़डकी उनके रोलमॉडल बन जाते हैं और वैसे ही गुण वाला इंसान या वही इंसान उनके दिलो-दिमाग में रच बस जाता है तो वो उसे पाने के लिए रिश्तों की मर्यादा को तो़डने से भी परहेज नहीं करते हैं, उन्हें लगने लगता है जब उन्हें यहीं सब कुछ मिल रहा है तो बाहर जाने की जरूरत ही नहीं है।

बेटे से बेहतर बेटी......‏

ऐश्वर्या राय बच्चन को बेटी होना बेटे से बेहतर है। इससे होगा यह कि बेटियों के पक्ष में थोड़ा-सा माहौल बनेगा और लोग लिंग परीक्षण से परहेज करेंगे। 


ऐश्वर्या चाहतीं तो शिशु का लिंग परीक्षण करा सकती थीं  और यह सुनिश्चित कर सकती थीं कि पहली संतान के रूप में उनके यहाँ बेटी नहीं हो क्योकि उनको सारी चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध थीं। किन्तु  उन्होंने न तो शिशु का लिंग परीक्षण कराया और न ही बेटी पैदा करने में झिझक दिखाई।

इससे बेटियों के पक्ष में थोड़ा-सा माहौल बनेगा और लोग लिंग परीक्षण से परहेज करेंगे। चाहे आपकी नीयत लड़का-लड़की में भेद करने की नहीं हो, पर यदि आप लिंग परीक्षण करा लेते हैं, तो उस रोमांच से वंचित हो जाते हैं जो सौर ग्रह से खबर के रूप में आता है (Which announce by Nurse )। उस रोमांच का, उस एक पल का मजा वही जानते हैं जो पिता या दादा-दादी, नाना-नानी बने हैं। 

ऐश्वर्या को बेटा होता तो बहुत लोगों में यह संदेश जाता कि ऐश्वर्या राय के गर्भ धारण की खबरें पहले भी आती रही हैं। पहले गर्भ में बेटियाँ रही होंगी सो अबॉर्शन कराती रहीं और अब बेटा पेट में आया तो उसे जन्म दे दिया। समाज का एक अधपढ़ा वर्ग तो जरूर ऐसा है, जिसके मन में इस तरह की बातें उठतीं।

फिर इसका परिणाम यह होता कि उस वर्ग की बहुत-सी महिलाएँ गर्भ में बेटियों को मरवातीं और सोचतीं कि जब ऐश्वर्या ऐसा कर सकती हैं, तो वे क्यों नहीं। अमिताभ भी एक मंच पर पोते की ख्वाहिश जाहिर कर चुके थे, सो सबको यही शक होता कि ऐश्वर्या ने चुनकर, सोच-समझकर और तरकीबें लगाकर बेटा पैदा किया है। मगर कुदरत ने जो किया बहुत अच्छा किया। 

अभिषेक-ऐश्वर्या का सम्मान लोगों के मन में और बढ़ गया है कि उन्होंने बेटी पैदा की। अमिताभ दादा बने हैं, खुशी की बात है। पर इससे भी ज्यादा खुशी इस बात की है कि उन्हें पोता नहीं पोती हुई है। लक्ष्मी और सरस्वती से भरे पूरे घर में साक्षात लक्ष्मी आई है। सरस्वती की भी इस पर उतनी ही कृपा हो, जितनी अमिताभ पर है। अमिताभ की पोती इस मामले में तो बहुत ही खुशनसीब है कि पूरा देश उसे दुआएँ दे रहा है।