दोस्तों,
तकनिकी महाविद्यालयों का वर्त्तमान स्वरुप सर्वविदित है, और उनमे व्यापत भ्रष्टाचार भी किसी से छुपी नहीं है.
हम निम्न बिन्दुओं के ध्यान में रखकर इसका अवलोकन करेंगे"
तकनिकी महाविद्यालयों का वर्त्तमान स्वरुप सर्वविदित है, और उनमे व्यापत भ्रष्टाचार भी किसी से छुपी नहीं है.
हम निम्न बिन्दुओं के ध्यान में रखकर इसका अवलोकन करेंगे"
- ए.आई.सी.ई.टी के अनुदेशों का पालन.
- विश्वविद्यालय ने नियमों का पालन.
- विज्ञापनों में उल्लेखित शुविधाओं की उपलब्धता.
- महाविद्यालय में व्यापत राजनीती/चुगली.
ए.आई.सी.ई.टी ने प्राध्यापक एवं छात्र का रेसिओ निर्धारित कर रखा है और प्राध्यापकों का वेतन निर्धारण भी उनके पद के अनुसार की जानी होती है किन्तु प्राध्यापकों अवाम अन्य कर्मचारिओं को निर्धारित वेतन से काफी कम दी जाती है और हस्ताक्षर उतनी ही सेलरी पर करवाते है जितनी ऐ.आई.सी.टी. के नियम के अनुसार है , कर्मचारी कि मजबूरी है जॉब करना घर जो पलना है बेचारे को.तकनिकी महाविद्यालय द्वारा फर्जी बायोडाटा , और कागज दिखाकर A.I.C.E.T कि आँखों में धुल झोंका जाता है.
ऐसे कर्मचारियों क़ा व्योरा और दस्तावेज दिखाते है जो उस महाविद्यालय में काम ही नहीं करता,
हो सकता है आपका अगला सवाल हो की आखिर ये दस्तावेज लटें कहा से है?जब ये लोग अपने यहाँ शिक्षकों को नियोजित करते है और उन्हें साक्षात्कार के लिए बुलाते है तो तो उनके दस्तावेजों कि क्षाया प्रति मसाक्षात्कार के समय पर मंगाते है. अब जिनको ये चयनित करतें है उनको तो जॉब देते है, और जिनको नहीं करते उनके दस्तावेज रख लेते है और उनसे कहते है कि अभी आप वेटिंग में हो. जब कभी निरिक्षण क़ा समय होता है तो महाविद्यालय द्वारा उन्ही दस्तावेजों को दिखा दिया जाता है.
तकनिकी महाविद्यालयों द्वारा छात्रों को प्रवेश के समय विज्ञापनों के द्वारा अपने कोलिजो में ऐसी शुविधाये दिखाते है विज्ञापन में जो इन कोलिजो में कभी होती ही नहीं है.
इतना ही नहीं, छात्रों के प्लेसमेंट समय पर कुछमाहविद्यालय तो फर्जी कंपनी बुलाकर फर्जी प्लेसमेंट करवा देते है, जिससे छात्रों ये ना लगे कि कॉलेज में कंपनी नहीं आई, लेकिन जब इनकी ज्वायनिंग क़ा समय आता है तब छात्रों को असलियत क़ा पता चतला है किन्तु तब तक वो कॉलेज से पास हो चुकें होतें है.
अब आतें है तकनिकी महाविद्यालयों में व्याप्त तथाकथित राजनीती/चुगली के मुद्दे पर,
आज कल इन महाविद्यालयों में जो कार्यरत कर्मचारी और अध्यापकों में से कुछ माहौल को बिलकुल बिगाड़ कर रख देते है , जैसे की वो नये अध्यापक को किसी ना किसी माममले में फंसाकर निकलवाने की कोशिश , या फिर उनका इतना शोषण करते है कि वो बेचारा खुद ही नौकरी छोड़कर चला ज़ाता है.कुछ अध्यापक तो कक्षाओं में भी छात्रों को पढाने में भी रूचि नहीं दिखाते और उनको "इन्टरनल मार्क्स" देकर खुश कर देते है जिससे कि छात्र कोई शिकायत ना करे. जब कोई छात्र शिकायत करता है तो "इन्टरनल मार्क्स" कि धमकी शिक्षक और महाविद्यालय द्वारा दी जाती है. कुछ लोग संस्था में चापलूसी का माहौल बना देते , वो अपना काम सही से नहीं कर पते वे महाविद्यालय के प्राचार्य/निदेशक कि चापलूसी करते है और दूसरो कि चुगली करते है ताकि वो खुद कि नौकरी बचा सके. अब बात करते है कि क़ी किस तरह से निदेशक और चेयरमैन कर्मचारियों क़ा शोषण करते है, जैसे क़ी इन तथाकथित महाविद्यालयों में देखा ज़ाता है क़ी जब कमर्चारी के वेतन वृद्धिक़ी बात आती है ये उसको भरा क़ा रास्ता दिखा देते है या फिर इतना मानशिक उत्पीडन करते है क़ी वो खुद नौकरी छोड़कर चला जाये. जब कोई कर्मचारी अपनी कोई समस्या लेकर निदेशक और चेयरमैन के पास जाता है तो ये कहते है क़ी आप कही और जॉब देख लीजये. वेतन भुगतान के सम्बन्ध में जहा तक मेरी जानकारी है, सभी कर्मचारिओं को महीने क़ी वेतन अगले महीने क़ी 10 तारीख तक हर हाल में उसको मिल जानी चाहिए . पर ये लोग अगले महीने क़ी 25 तारीख के बाद ही देते है.
(विशेष: शुधि पाठकों से अनुरोध है की वे इस आलेख को विवाद का विषय न बनाये. क्योकि ये मेरा स्वयं का विचार है किन्तु कुछ महाविद्यालयों के सम्बन्ध में ये सत्य भी है जो समय समय पर समाचारों के माध्यम से लोगों तक पहुचते रहता है.)
आज कल इन महाविद्यालयों में जो कार्यरत कर्मचारी और अध्यापकों में से कुछ माहौल को बिलकुल बिगाड़ कर रख देते है , जैसे की वो नये अध्यापक को किसी ना किसी माममले में फंसाकर निकलवाने की कोशिश , या फिर उनका इतना शोषण करते है कि वो बेचारा खुद ही नौकरी छोड़कर चला ज़ाता है.कुछ अध्यापक तो कक्षाओं में भी छात्रों को पढाने में भी रूचि नहीं दिखाते और उनको "इन्टरनल मार्क्स" देकर खुश कर देते है जिससे कि छात्र कोई शिकायत ना करे. जब कोई छात्र शिकायत करता है तो "इन्टरनल मार्क्स" कि धमकी शिक्षक और महाविद्यालय द्वारा दी जाती है. कुछ लोग संस्था में चापलूसी का माहौल बना देते , वो अपना काम सही से नहीं कर पते वे महाविद्यालय के प्राचार्य/निदेशक कि चापलूसी करते है और दूसरो कि चुगली करते है ताकि वो खुद कि नौकरी बचा सके. अब बात करते है कि क़ी किस तरह से निदेशक और चेयरमैन कर्मचारियों क़ा शोषण करते है, जैसे क़ी इन तथाकथित महाविद्यालयों में देखा ज़ाता है क़ी जब कमर्चारी के वेतन वृद्धिक़ी बात आती है ये उसको भरा क़ा रास्ता दिखा देते है या फिर इतना मानशिक उत्पीडन करते है क़ी वो खुद नौकरी छोड़कर चला जाये. जब कोई कर्मचारी अपनी कोई समस्या लेकर निदेशक और चेयरमैन के पास जाता है तो ये कहते है क़ी आप कही और जॉब देख लीजये. वेतन भुगतान के सम्बन्ध में जहा तक मेरी जानकारी है, सभी कर्मचारिओं को महीने क़ी वेतन अगले महीने क़ी 10 तारीख तक हर हाल में उसको मिल जानी चाहिए . पर ये लोग अगले महीने क़ी 25 तारीख के बाद ही देते है.
(विशेष: शुधि पाठकों से अनुरोध है की वे इस आलेख को विवाद का विषय न बनाये. क्योकि ये मेरा स्वयं का विचार है किन्तु कुछ महाविद्यालयों के सम्बन्ध में ये सत्य भी है जो समय समय पर समाचारों के माध्यम से लोगों तक पहुचते रहता है.)
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