दोस्तों,
हमलोग प्रतिदिन अपने आस- पास ऐसे ढेरों लवर्स को देखतें है जो एक-दूसरे से प्रेम करने का दंभ तो भरते हैं और साथ जीने मरने की नित नए कशमें खातें है. लेकिन वे यह भी भली-भांति जानते हैं कि उनकी पसंद उनके अभिभावकों को किसी भी रूप में पसंद नहीं आएगी. इसके पीछे अभिभावकों की रुढ़िवादी मानसिकता या अलग-अलग जाति या धर्म का होना एक बड़ा कारण बनते हैं.
कभी कभी में इन लवर्स को देखकर यह सोचने पर मजबुर हो जाता हूँ की क्या परिवार वालों से लड़-झगड़ कर या उन्हें मजबूर कर प्रेम विवाह कर खुशाल जिंदगी जिया जा सकता है?
अक्शर ये देखने में आता है की लड़का, लड़की के स्वभाव और अपने परिवार की पसंद को बहुत अच्छी तरह समझता है और ये जानते हुए कि लड़की कभी भी उसके परिवार के अनुसार खुद को ढाल नहीं पाएगी, अपने अभिभावकों को राजी करवाने की पूरी-पूरी कोशिश करतें है.
अगर इस तरह के प्रेमी युगल अगर विवाह के बंधन में बंध भी जाते हैं तो उनके प्रेमपूर्वक रहने की संभावना बहुत कम या ना के बराबर ही होती हैं.
हमारे समाज में विवाह के पश्चात बेटी को अपने पिता का घर छोड़कर पति के घर जाना होता है. ऐसे में अगर वह लड़की प्रेम विवाह करने जा रही हैं तो निश्चित है कि वह लड़के के स्वभाव और आर्थिक स्थिति से पूरी तरह आशवस्त होने के बाद ही विवाह करने का निर्णय लेती है. अगर माता-पिता इस रिश्ते से राजी ना भी हो तो भी वह थोड़े मनमुटाव के बाद बेटी की खुशी के लिए इस रिश्ते को मंजूरी दे देते हैं. उन्हें लगता है कि अगर लड़का उसे शादी के बाद खुश रखेगा तो इसमें कोई परेशानी नहीं है.
किन्तु लड़कों के साथ ऐसा नहीं है, विवाहोपरान्त लड़का अपनी पत्नी के साथ अपने अभिभावकों के साथ रहता है. अगर उसके अभिभावकों को यह लड़की पसंद ना हुई या किसी कारण वश उन्होंने पूरी आत्मीयता के साथ अपनी वधु को स्वीकार नहीं किया तो निश्चित है परिवार में हर समय कलह या मनमुटाव का वातावरण बना रहता है, लड़की को भले ही ज्यादा परेशान ना किया जाये किन्तु उस परिवार का बेटा अपनी पत्नी और माता-पिता के बीच के लड़ाई-झगड़ों में अपने आप को बुरी तरह उलझा हुआ पता है. वह ना तो उस लड़की (पूर्व प्रेमिका जो अब पत्नी है) को कुछ कह सकता है और ना ही अभिभावकों के साथ अपनी समस्या बयां कर सकता है.प्रेम-विवाह में सामान्यतः ये देखने को मिलता है की पत्नियां अपने पति पर पूरी तरह हावी हो जाती हैं, उन्हें वैवाहिक जीवन को निभाना अपनी जिम्मेदारी की जगह पति की मजबूरी लगने लगता है.
इस प्रेम विवाह में पत्निओं को लगता है कि उनके प्रेमी ने उनसे इसीलिए विवाह किया है, की वो उनके बिना नहीं रह सकतें.इस प्रकार के विचारों से घर में कलह ज्यादा बढ़ जाती है और खुद को मनचाही स्वतंत्रता ना मिलने पर वह पति को अलग होने के लिए कहती हैं और बिगड़ते हालातों को संभालने के लिए बेटे को अपने परिवार से अलग होना ही पड़ता है.
कभी कभी में इन लवर्स को देखकर यह सोचने पर मजबुर हो जाता हूँ की क्या परिवार वालों से लड़-झगड़ कर या उन्हें मजबूर कर प्रेम विवाह कर खुशाल जिंदगी जिया जा सकता है?
अक्शर ये देखने में आता है की लड़का, लड़की के स्वभाव और अपने परिवार की पसंद को बहुत अच्छी तरह समझता है और ये जानते हुए कि लड़की कभी भी उसके परिवार के अनुसार खुद को ढाल नहीं पाएगी, अपने अभिभावकों को राजी करवाने की पूरी-पूरी कोशिश करतें है.
अगर इस तरह के प्रेमी युगल अगर विवाह के बंधन में बंध भी जाते हैं तो उनके प्रेमपूर्वक रहने की संभावना बहुत कम या ना के बराबर ही होती हैं.
हमारे समाज में विवाह के पश्चात बेटी को अपने पिता का घर छोड़कर पति के घर जाना होता है. ऐसे में अगर वह लड़की प्रेम विवाह करने जा रही हैं तो निश्चित है कि वह लड़के के स्वभाव और आर्थिक स्थिति से पूरी तरह आशवस्त होने के बाद ही विवाह करने का निर्णय लेती है. अगर माता-पिता इस रिश्ते से राजी ना भी हो तो भी वह थोड़े मनमुटाव के बाद बेटी की खुशी के लिए इस रिश्ते को मंजूरी दे देते हैं. उन्हें लगता है कि अगर लड़का उसे शादी के बाद खुश रखेगा तो इसमें कोई परेशानी नहीं है.
किन्तु लड़कों के साथ ऐसा नहीं है, विवाहोपरान्त लड़का अपनी पत्नी के साथ अपने अभिभावकों के साथ रहता है. अगर उसके अभिभावकों को यह लड़की पसंद ना हुई या किसी कारण वश उन्होंने पूरी आत्मीयता के साथ अपनी वधु को स्वीकार नहीं किया तो निश्चित है परिवार में हर समय कलह या मनमुटाव का वातावरण बना रहता है, लड़की को भले ही ज्यादा परेशान ना किया जाये किन्तु उस परिवार का बेटा अपनी पत्नी और माता-पिता के बीच के लड़ाई-झगड़ों में अपने आप को बुरी तरह उलझा हुआ पता है. वह ना तो उस लड़की (पूर्व प्रेमिका जो अब पत्नी है) को कुछ कह सकता है और ना ही अभिभावकों के साथ अपनी समस्या बयां कर सकता है.प्रेम-विवाह में सामान्यतः ये देखने को मिलता है की पत्नियां अपने पति पर पूरी तरह हावी हो जाती हैं, उन्हें वैवाहिक जीवन को निभाना अपनी जिम्मेदारी की जगह पति की मजबूरी लगने लगता है.
इस प्रेम विवाह में पत्निओं को लगता है कि उनके प्रेमी ने उनसे इसीलिए विवाह किया है, की वो उनके बिना नहीं रह सकतें.इस प्रकार के विचारों से घर में कलह ज्यादा बढ़ जाती है और खुद को मनचाही स्वतंत्रता ना मिलने पर वह पति को अलग होने के लिए कहती हैं और बिगड़ते हालातों को संभालने के लिए बेटे को अपने परिवार से अलग होना ही पड़ता है.
आज-कल के लवर्स प्रेम संबंध को प्रेम विवाह विवाह में तब्दील करे की कोशिश करतें तो है किन्तु उन्हें ये नहीं पता होता की प्रेम संबंध निभाना उतना जटिल कार्य नहीं होता जितना एक गलत जीवनसाथी के साथ "प्रेम विवाह" करने के पश्चात वैवाहिक जीवन बिताना.अभिभावक अपने बच्चों के खुशी के लिए अपनी जरूरतें तक त्याग देये हैं. किन्तु उस बच्चे का एक गलत कदम उन्हें जीवन भर के लिए दुख दे जाता है. ऐसे हालातों को देखते हुए यह कहना कदापि गलत नहीं होगा कि प्रेम-विवाह करने के बाद अगर किसी को नुकसान होता है तो वह मात्र उस लड़के को जिसने परिवार वालों की मर्जी और इच्छाओं को पीछे छोड़ दिया.
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