Sunday, 28 October 2012

क्यों बढ़ रहा साइबर क्राइम?


शहर में इन दिनों लगातार हो रही साइबर क्राइम के कारण ग्वालियर के लोगों की चैन गायब सी हो गई है।
शहरवासियों के कान तब खडे़ हो गए, जब यहां साइबर क्राइम का ग्राफ अचानक बढ़ गया। साइबर क्राइम की घटनाएं गाहे-बगाहे शहरवासियों को सकते में डाल देती हैं। लाख कोशिश के बावजूद आखिर क्यों नही रूक रहा है ये साइबर क्राइम? क्या वजह है कि इन अपराधों में हमारे देश के भविष्य कहे जाने वाले युवाओं की भूमिका हमेशा ही जुड़ी दिखती है। यह एक विचारणीय प्रश्न है।
शहर में संचालित साइबर कैफे का सूचीबद्ध नहीं होना भी साइबर अपराध को बढ़ावा देने में भूमिका निभाता है। एक साथ फोटो कॉपी या अन्य दुकान के साथ-साथ एक या दो कमरों में साइबर कैफे भी व्यवसाय की दृष्टिकोण से खोल लिया जाता है। अभी शहर में करीब 130  से अधिक साइबर कैफे हैं, लेकिन इनमे से ज्यादात्तर का पंजीयन भी नहीं है।
सूत्रों की माने तो कई साइबर कैफे में कई नकली प्रमाण पत्र, परिचय पत्र, वोटर आइ कार्ड, सहित अन्य कई नकली कागजातों का भी निर्माण किया जाता है। इन कागजातों से मोबाइल सिम की खरीद सहित अन्य आवश्यक जरूरतों को पूरा कर अपराध कार्यो में सहायता मिलती है।
साइबर क्राइम की घटनाओं का एक प्रमुख कारण साइबर कैफे  संचालकों द्वारा नियमों का पालन नहीं किया जाना है। रजिस्टर मेनटेन नहीं किया जाता है। संचालक ग्राहकों का पहचान पत्र और पता दर्ज नही करते जिससे ऐसी घटनाओं में वृद्धि होती है। इस उदासीनता के कारण कई बार आंतकी व आपराधिक चरित्र वाले लोग अपने मंसूबे को अंजाम देने में सफल हो जाते है।
इन सब के साथ साइबर पुलिस द्वारा साइबर अपराध के जाँच एवं कार्यवही में भी सिथिलिता बरती जा रही है। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते है की, ग्वालियर साइबर थाना में एक शिकायत 29  फ़रवरी को दी गयी, चार महीने से अधिक का समय बीत जाने के पश्चात भी पुलिस शिकायत पर कोई कार्यवाही नहीं की।
पुलिस की लचर जांच व्यवस्था का सबसे बड़ा सबूत है कि देश में 1995 में इंटरनेट आने के बाद से अब तक साइबर अपराध के तीन सिर्फ मुकदमों में ही सजा हो पाई है। पुलिस की कोताही का सबसे बड़ा नमूना तो नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े भी पेश करते हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक 2010 में पूरे देश में सिर्फ हजार के करीब साइबर अपराध दर्ज किए गए हैं। जबकि अखबारों में रोजाना इस तरह के मामलों की रिपोर्टिंग देखी जा सकती है।

>>कैसे बचें साइबर अपराधिओं के शिकार होने से?
   विशेषज्ञ कहते हैं कि साइबर बुलिंग और ब्लैकमेलिंग के मामलों में ज्यादातर देखा गया है कि पीड़ितों के करीबी ही इस तरह के काम को अंजाम देते हैं। इसलिए इंटरनेट यूजर्स को सर्फिंग करते वक्त अपनी पहचान को पूरी तरह से गुप्त और सुरक्षित रखना चाहिए। उनको अपना पासवर्ड छिपा कर रखना चाहिए। वहीं अभिभावकों को भी इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले अपने बच्चों पर नजर रखनी चाहिए। साथ ही बच्चों को साइबर अपराध के खतरों से भी अवगत कराना चाहिए।

Saturday, 28 April 2012

क्या निर्मल बाबा वास्तव में ढोंगी है?

अगर तुम किसी के वाक् जाल में स्वयं फंसते हैं तो इसमें उस व्यक्ति का दोष क्या जो अपना हित साधने के लिए आपकी तरफ चारा फेंक रहा हैं. दोष तो उसका मानना चाहिए जो ऐसे छ्द्म जाल में फंसता है. इस पर भी यदि हमारी नजर में ठगे गए लोग स्वयं यह कहें कि वे ठगे नहीं गए हैं तो फिर हम किस पर ठगी करने का आरोप लगा रहे हैं. कुछ ऐसा ही मामला निर्मल जीत सिंह यानि निर्मल बाबा का भी है जिन पर आरोप तो ढेर सारे लगाए जा रहे हैं किंतु सही मायने में उन पर किसी भी आरोप की पुष्टि नहीं की जा सकती है. बाबा और उनके भक्तों के बीच जो घटित हो रहा है उससे आखिर हमें इतना ऐतराज क्यों?
टी.वी. खोलते ही हमें कितने ही ऐसे संत-महात्मा नजर आ जाते हैं जो खुले आम अपनी तथाकथित दैवीय शक्तियों का बखान कर रहे होते हैं. उनका तो यह साफ कहना है कि उनकी शरण में आकर किसी भी व्यक्ति की सभी समस्याएं और परेशानियां छू-मंतर हो सकती हैं. पहले भले ही आम जनमानस का इनके प्रति रुझान कम होता था लेकिन मीडिया और आधुनिक संचार माध्यमों ने ऐसे बाबाओं की लोकप्रियता पर चार चांद लगा दिया है. लेकिन आजकल जिस बाबा को मीडिया निशाना बनाकर सबसे ज्यादा प्रचारित कर रहा है वह है निर्मलजीत सिंह नरुला उर्फ निर्मल बाबा.
निर्मल बाबा, समागम के नाम पर निर्मल दरबार लगाकर आम जनता की परेशानियों का हल निकालने की कोशिश करते हैं. वैसे अगर हम यह कहें कि लगभग-लगभग हल निकाल ही देते हैं तो यह भी गलत नहीं होगा. यही वजह है कि आज निर्मल बाबा ने पिछले सभी प्रसिद्ध बाबाओं को पूरी तरह फ्लॉप कर दिया है. रोज टी.वी. पर विशेषकर न्यूज चैनलों पर थर्ड आई ऑफ निर्मल बाबा नामक कार्यक्रम का प्रसारण किया जाता है, जिसमें निर्मल बाबा दुखियारी जनता की समस्याओं को हल करते नजर आते हैं. भले ही वह समस्याएं समोसा और गोलगप्पे खाने से ही क्यों ना हल होती हों लेकिन अंत में हमें तो सिर्फ आम खाने से मतलब होना चाहिए.
खैर, इसमें कोई दो राय नहीं है कि निर्मल बाबा की लोकप्रियता का सारा श्रेय सिर्फ और सिर्फ मीडिया को ही जाता है. पहले निर्मल बाबा के चमत्कारों को इतना बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया लेकिन अब वह पता नहीं क्यों इनके चमत्कारों की बखिया उधेड़ने पर लगी हुई है !!
पिछले कुछ समय में निर्मल बाबा के ऊपर ना जाने कितने ही आरोप दर्ज किए जा चुके हैं. कोई कहता है वह ढोंगी हैं, कोई उन्हें ठग कहता है तो कोई उन्हें लोभी और लालची व्यक्ति की संज्ञा देता है. लेकिन हम उन लोगों को क्या कहेंगे जिन्हें निर्मल बाबा के नुस्खों का भरपूर फायदा मिला है, जो उन्हें भगवान से कम नहीं पूजते.
हो सकता है आप लोग उन्हें अनपढ़ और बेवकूफ लोग समझते हों, लेकिन शायद कोई व्यक्ति ऐसा नहीं हो सकता जो इतना बेवकूफ हो कि उसे अपने परिमार्जित होते हालात नजर ना आएं. अगर निर्मल बाबा के पास किसी भी तरह की कोई शक्ति है तो वह सिर्फ वही व्यक्ति समझ सकता है जिस पर उनकी कृपा बरसी है, आप या मैं नहीं जिन्होंने कभी निर्मल बाबा पर विश्वास तो नहीं किया लेकिन उन पर हमेशा आरोप ही लगाए हैं. हो सकता है कि बाबा की जिस नकारात्मक छवि को आजकल प्रचारित किया जा रहा है वह सही हो लेकिन बिना किसी साक्ष्य के हम इसे स्वीकार तो नहीं कर सकते.
वैसे तो यह बात भी सच है कि अगर निर्मल बाबा एक ठग और ढोंगी हैं, तो उनसे भी कई बड़े ठग गेरुए वस्त्र पहनकर जनता की भावनाओं और उनके पैसे के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. उन्हें अपने अनुयायियों का समर्थन इस कदर मिला हुआ है कि उन पर किसी भी प्रकार का आरोप लगाना किसी के बस की बात नहीं.
अगर निर्मल बाबा ढोंगी हैं तो उन्होंने कभी किसी को जबरदस्ती अपने समागम में कभी नहीं बुलाया, लोग स्वयं वहां गए. अगर कोई व्यक्ति खुद यह चाहता है कि उसके साथ धोखेबाजी हो तो इसमें क्या उस व्यक्ति की गलती है जो उनके साथ खिलवाड़ कर रहा है. लेकिन अगर निर्मल बाबा के चमत्कारों में थोड़ी भी सच्चाई है और अपने भक्तों पर कृपा बरसाने के लिए वह उनसे दस प्रतिशत की मांग कर भी लेते हैं तो इसमें बुराई क्या है?
निर्मल बाबा अपने चमत्कार दिखा कर धन बटोर रहे हैं वहीं न्यूज चैनल, भले ही नकारात्मक रूप से, उन्हें दिन रात प्रचारित कर अपनी टीआरपी बढ़ा रहे हैं. किंतु इन सबके बीच ये सवाल हमेशा बना रहेगा कि आखिर बाबा और उनके भक्तों के बीच के संबंधों पर अपनी नाइत्तेफाकी दर्शा करके हम कैसे सच को उद्घाटित कर सकेंगे?

Friday, 3 February 2012

तकनिकी महाविद्यालयों में व्यापत भ्रष्टाचार

दोस्तों,
तकनिकी महाविद्यालयों का वर्त्तमान स्वरुप सर्वविदित है, और उनमे व्यापत  भ्रष्टाचार भी किसी से छुपी नहीं है.
हम निम्न बिन्दुओं के ध्यान में रखकर इसका अवलोकन करेंगे"
  1. ए.आई.सी.ई.टी के अनुदेशों का पालन.
  2. विश्वविद्यालय ने नियमों का पालन.
  3. विज्ञापनों में उल्लेखित शुविधाओं की उपलब्धता.
  4. महाविद्यालय में व्यापत राजनीती/चुगली.
तो शुरुआत करतें है  ए.आई.सी.ई.टी (A.I.C.E.T) के अनुदेशों के पालन से,
         ए.आई.सी.ई.टी  ने प्राध्यापक एवं छात्र  का रेसिओ निर्धारित कर रखा है और प्राध्यापकों का वेतन निर्धारण भी उनके पद के अनुसार की जानी होती है किन्तु  प्राध्यापकों अवाम अन्य कर्मचारिओं को  निर्धारित वेतन से  काफी कम दी जाती है और हस्ताक्षर उतनी ही सेलरी पर करवाते है जितनी ऐ.आई.सी.टी. के नियम के अनुसार है , कर्मचारी कि मजबूरी है जॉब करना घर जो पलना है बेचारे को.तकनिकी महाविद्यालय द्वारा फर्जी बायोडाटा , और कागज दिखाकर A.I.C.E.T  कि आँखों में धुल झोंका जाता है.
ऐसे कर्मचारियों क़ा व्योरा और दस्तावेज दिखाते है जो उस महाविद्यालय में काम ही नहीं करता,
हो सकता है आपका अगला सवाल हो की आखिर ये दस्तावेज लटें कहा से है?
जब ये लोग अपने यहाँ शिक्षकों को नियोजित करते है और उन्हें साक्षात्कार के लिए बुलाते है तो तो उनके दस्तावेजों  कि क्षाया प्रति मसाक्षात्कार के समय पर मंगाते है. अब जिनको ये चयनित करतें है उनको तो जॉब देते है, और जिनको नहीं करते उनके दस्तावेज रख लेते है और उनसे कहते है कि अभी आप वेटिंग में हो. जब कभी निरिक्षण  क़ा समय होता है तो महाविद्यालय द्वारा उन्ही दस्तावेजों को दिखा दिया जाता है.

    
तकनिकी महाविद्यालयों द्वारा छात्रों को प्रवेश के समय विज्ञापनों के द्वारा  अपने कोलिजो में ऐसी शुविधाये दिखाते है विज्ञापन में जो इन कोलिजो में कभी होती ही नहीं है.
  इतना ही नहीं, छात्रों के प्लेसमेंट
 समय पर कुछमाहविद्यालय तो फर्जी कंपनी बुलाकर फर्जी प्लेसमेंट करवा देते है, जिससे छात्रों ये ना लगे कि कॉलेज में कंपनी नहीं आई, लेकिन जब इनकी ज्वायनिंग क़ा समय आता है तब छात्रों को असलियत क़ा पता चतला है किन्तु तब तक वो कॉलेज से पास हो चुकें होतें है.
 
  अब आतें है तकनिकी महाविद्यालयों में व्याप्त तथाकथित राजनीती/चुगली के मुद्दे पर,
आज कल इन महाविद्यालयों में जो कार्यरत कर्मचारी और अध्यापकों में से कुछ माहौल को बिलकुल बिगाड़ कर रख देते है , जैसे की वो नये अध्यापक को किसी ना किसी माममले में फंसाकर निकलवाने की कोशिश , या फिर उनका इतना शोषण करते है कि वो बेचारा खुद ही नौकरी छोड़कर चला ज़ाता है.कुछ अध्यापक तो कक्षाओं में भी छात्रों को पढाने में भी रूचि नहीं दिखाते और उनको "इन्टरनल मार्क्स" देकर खुश कर देते है जिससे कि छात्र कोई शिकायत ना करे.  जब कोई छात्र शिकायत करता है तो "इन्टरनल मार्क्स" कि धमकी शिक्षक और महाविद्यालय द्वारा दी जाती है.   कुछ लोग संस्था में  चापलूसी का माहौल बना देते , वो अपना काम सही से नहीं कर पते वे महाविद्यालय के प्राचार्य/निदेशक कि चापलूसी करते है और दूसरो कि चुगली करते है ताकि वो खुद कि नौकरी बचा सके.    अब बात करते है कि क़ी किस तरह से निदेशक और चेयरमैन कर्मचारियों क़ा शोषण करते है, जैसे क़ी इन तथाकथित महाविद्यालयों में देखा ज़ाता है क़ी जब कमर्चारी के वेतन वृद्धिक़ी बात आती है ये उसको भरा क़ा रास्ता दिखा देते है या फिर इतना मानशिक उत्पीडन करते है क़ी वो खुद नौकरी छोड़कर चला जाये. जब कोई कर्मचारी अपनी कोई समस्या लेकर  निदेशक और चेयरमैन के पास जाता है तो ये कहते है क़ी आप कही और जॉब देख लीजये. वेतन भुगतान के सम्बन्ध में जहा तक मेरी जानकारी है,  सभी कर्मचारिओं को महीने क़ी वेतन अगले महीने क़ी 10  तारीख तक हर हाल में उसको मिल जानी चाहिए . पर ये लोग अगले महीने क़ी 25  तारीख के बाद ही देते है.

(विशेष: शुधि पाठकों से अनुरोध है की वे इस आलेख को विवाद का विषय न बनाये. क्योकि ये मेरा स्वयं का विचार है किन्तु कुछ महाविद्यालयों के सम्बन्ध में ये सत्य भी है जो समय समय पर समाचारों के माध्यम से लोगों तक पहुचते रहता है.)

Wednesday, 25 January 2012

रखैल व्यवस्था का आधुनिक रूप "Live in Relationship"

दोस्तों,
हो सकता है की "Live in Relationship" के बारे में आप लोगों के विचार अलग-अलग हो किन्तु मेरी मने तो ये "रखैल व्यवस्था" का ही आधुनिक रूप है.
आज कल के युवा पीढ़ी इस गैर सामाजिक संबंधों के प्रति अत्याधिक आकर्षित दिखाई दे रही है. उनका तर्क होता है कि विवाह के बंधन में बंधने से पहले एक-दूसरे को अच्छी तरह से समझ लिया जाए तो वैवाहिक जीवन में सामंजस्य बैठा पाना आसान हो जाता है. समाज द्वारा महिला और पुरुष को विवाह से पहले साथ रहने की इजाजत  न होने के बावजूद युवा लिव इन में जाने से बिलकुल नहीं हिचकिचाते.कुछ लोग मानना है कि यह प्रथा भारतीय समाज में प्राचीन समय से "रखैल"  के स्वरूप में व्याप्त है किन्तु वो यह भूल जाते हैं, कि दोनों मे कितना अन्तर है। साधारण भाषा में रखैल को रक्खा जाता था जिसमे पुरुष की इच्छा सर्वोपरि होती थी स्त्री मजबूरी बस या जर्बजस्ती मे रहती थी ।  उसे पत्नी की हैंसियत भी नही मिलती थी। स्त्री स्वेच्छा से किसी की रखैल बनना स्वीकार नही करती थी। दूसरे तरफ "लिव इन" मे स्त्री स्वेच्छा से रहना स्वीकार करती है और उसे वो विचारों की आधुनिकता और स्वतन्त्रता कहती है। युवा पीढी भट्क गयी है, या नही ये तो हम नही कह सकते परन्तु जो भी इन सम्बन्धों को सहमति देता है, उसकी सोच अवश्य भारतीय संस्कृत के विपरीत है
आप "  लिव इन रिलेशनशिप " की वकालत करने वालों से यह प्रश्न पुछ सकतें है की:
१. क्या  "लिव इन रिलेशनशिप " विवाह की गारंटी लेता है?
आज कल  लिव इन के टूटने और प्रेमी के धोखा देने के बाद सुसाइड  जैसी घटनाये दिन प्रतिदिन बढती जा रही है, लिव इन के टूटने के बाद   दुनियां के तानों से बचने के लिए स्त्री के पास "आत्महत्या" के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता.
भारतीय संस्कृति की गरिमा दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है, जिस भारत में लोग रिश्ते निभाने एवंम मूल्यों को मानने में अपने स्वार्थ की बलि दे देते हैं। जहां नदियों को माँ माना जाता हो, जहां पति को परमेश्वर का दर्जा दिया जाता हो,उसी भारत मे आज विवाह जैसी संस्था को हमारी युवा पीढी अस्वीकार करने लगी है, और लिव इन जैसी रिश्ते को स्वीकार करने लगी है ।उसके पीछे तर्क ये है, कि इसमे कोई बन्धन नही है । जब तक मन मिले तब तक रहो वरना अपना-अपना रास्ता नापो।आज हम अधिकार तो चाहते हैं। लेकिन कर्त्तव्य नही निभाना चाहते हैं। रिश्ते तो चाहते हैं।
परतुं जिम्मेदारियाँ नहीं चाहते इसलिए हम पश्चिमीसभ्यता के अधांनुकरण के फलस्वरूप लिव इन जैसे रिश्ते को स्वीकारने लगे हैं।"लिव इन रिलेशनशिप" की आड़ में वासनात्रप्ती की खुले आम स्वीकारोक्ती है। पति-पत्नी के रिश्ते से विभिन्न रिश्तों का स्रृजन होता है, वहीं लिव इन रिश्ते अपना ही स्थायित्व नही जानते। 
यह कहना कदापि गलत नहीं होगा कि महिलाओं के शोषण का नया दौर शुरू चुका है और अपनी आंखों पर आधुनिकता की पट्टी  बांधे युवक/युवतियां इस बात को सोचना तो दूर, सुनना भी पसंद नहीं करते, और इस प्रकार के अमर्यादित रिश्तों को बेहिच अपना रहे है

Wednesday, 18 January 2012

प्रेम-विवाह के अंजाम

दोस्तों,
हमलोग प्रतिदिन अपने आस- पास ऐसे ढेरों लवर्स को देखतें है जो एक-दूसरे से प्रेम करने का दंभ तो भरते हैं और साथ जीने मरने की नित नए कशमें खातें है. लेकिन वे यह भी भली-भांति जानते हैं कि उनकी पसंद उनके अभिभावकों को किसी भी रूप में पसंद नहीं आएगी. इसके पीछे अभिभावकों की रुढ़िवादी मानसिकता या अलग-अलग जाति या धर्म का होना एक बड़ा कारण बनते हैं.
कभी कभी में इन 
लवर्स को देखकर यह सोचने पर मजबुर हो जाता हूँ की क्या परिवार वालों से लड़-झगड़ कर या उन्हें मजबूर कर प्रेम विवाह कर खुशाल जिंदगी जिया जा सकता है?
अक्शर ये देखने में आता है की 
लड़का, लड़की के स्वभाव और अपने परिवार की पसंद को बहुत अच्छी तरह समझता है और ये जानते हुए कि लड़की कभी भी उसके परिवार के अनुसार खुद को ढाल नहीं पाएगी, अपने अभिभावकों को राजी करवाने की पूरी-पूरी कोशिश करतें है.
अगर इस तरह के प्रेमी युगल अगर विवाह के बंधन में बंध भी 
जाते हैं तो उनके प्रेमपूर्वक रहने की संभावना बहुत कम या ना के बराबर ही होती हैं.
हमारे समाज में 
विवाह के पश्चात बेटी को अपने पिता का घर छोड़कर पति के घर जाना होता है. ऐसे में अगर वह लड़की प्रेम विवाह करने जा रही हैं तो निश्चित है कि वह लड़के के स्वभाव और आर्थिक स्थिति से पूरी तरह आशवस्त होने के बाद ही विवाह करने का निर्णय लेती है. अगर माता-पिता इस रिश्ते से राजी ना भी हो तो भी वह थोड़े मनमुटाव के बाद बेटी की खुशी के लिए इस रिश्ते को मंजूरी दे देते हैं. उन्हें लगता है कि अगर लड़का उसे शादी के बाद खुश रखेगा तो इसमें कोई परेशानी नहीं है.
किन्तु लड़कों के साथ ऐसा नहीं है, विवाहोपरान्त
 लड़का अपनी पत्नी के साथ अपने अभिभावकों के साथ रहता है. अगर उसके अभिभावकों को यह लड़की पसंद ना हुई या किसी कारण वश उन्होंने पूरी आत्मीयता के साथ अपनी वधु को स्वीकार नहीं किया तो निश्चित है परिवार में हर समय कलह या मनमुटाव का वातावरण बना रहता है, लड़की को भले ही ज्यादा परेशान ना किया जाये किन्तु उस परिवार का बेटा अपनी पत्नी और माता-पिता के बीच के लड़ाई-झगड़ों में अपने आप को बुरी तरह उलझा हुआ पता है. वह ना तो उस लड़की (पूर्व प्रेमिका जो अब पत्नी है) को कुछ कह सकता है और ना ही अभिभावकों के साथ अपनी समस्या बयां कर सकता है.प्रेम-विवाह में सामान्यतः ये देखने को मिलता है की पत्नियां अपने पति पर पूरी तरह हावी हो जाती हैं, उन्हें वैवाहिक जीवन को निभाना अपनी जिम्मेदारी की जगह पति की मजबूरी लगने लगता है.
इस प्रेम विवाह में
 पत्निओं को लगता है कि उनके प्रेमी ने उनसे इसीलिए विवाह किया है, की वो उनके बिना नहीं रह सकतें.इस प्रकार के विचारों से घर में कलह ज्यादा बढ़ जाती है और खुद को मनचाही स्वतंत्रता ना मिलने पर वह पति को अलग होने के लिए कहती हैं और बिगड़ते हालातों को संभालने के लिए बेटे को अपने परिवार से अलग होना ही पड़ता है.
आज-कल के लवर्स प्रेम संबंध को प्रेम विवाह विवाह में तब्दील करे की कोशिश करतें तो है किन्तु उन्हें ये नहीं पता होता की प्रेम संबंध निभाना उतना जटिल कार्य नहीं होता जितना एक गलत जीवनसाथी के साथ "प्रेम विवाह" करने के पश्चात वैवाहिक जीवन बिताना.अभिभावक अपने बच्चों के खुशी के लिए अपनी जरूरतें तक त्याग देये हैं. किन्तु उस बच्चे का एक गलत कदम उन्हें जीवन भर के लिए दुख दे जाता है. ऐसे हालातों को देखते हुए यह कहना कदापि गलत नहीं होगा कि प्रेम-विवाह करने के बाद अगर किसी को नुकसान होता है तो वह मात्र उस लड़के को जिसने परिवार वालों की मर्जी और इच्छाओं को पीछे छोड़ दिया.