Sunday, 28 October 2012

क्यों बढ़ रहा साइबर क्राइम?


शहर में इन दिनों लगातार हो रही साइबर क्राइम के कारण ग्वालियर के लोगों की चैन गायब सी हो गई है।
शहरवासियों के कान तब खडे़ हो गए, जब यहां साइबर क्राइम का ग्राफ अचानक बढ़ गया। साइबर क्राइम की घटनाएं गाहे-बगाहे शहरवासियों को सकते में डाल देती हैं। लाख कोशिश के बावजूद आखिर क्यों नही रूक रहा है ये साइबर क्राइम? क्या वजह है कि इन अपराधों में हमारे देश के भविष्य कहे जाने वाले युवाओं की भूमिका हमेशा ही जुड़ी दिखती है। यह एक विचारणीय प्रश्न है।
शहर में संचालित साइबर कैफे का सूचीबद्ध नहीं होना भी साइबर अपराध को बढ़ावा देने में भूमिका निभाता है। एक साथ फोटो कॉपी या अन्य दुकान के साथ-साथ एक या दो कमरों में साइबर कैफे भी व्यवसाय की दृष्टिकोण से खोल लिया जाता है। अभी शहर में करीब 130  से अधिक साइबर कैफे हैं, लेकिन इनमे से ज्यादात्तर का पंजीयन भी नहीं है।
सूत्रों की माने तो कई साइबर कैफे में कई नकली प्रमाण पत्र, परिचय पत्र, वोटर आइ कार्ड, सहित अन्य कई नकली कागजातों का भी निर्माण किया जाता है। इन कागजातों से मोबाइल सिम की खरीद सहित अन्य आवश्यक जरूरतों को पूरा कर अपराध कार्यो में सहायता मिलती है।
साइबर क्राइम की घटनाओं का एक प्रमुख कारण साइबर कैफे  संचालकों द्वारा नियमों का पालन नहीं किया जाना है। रजिस्टर मेनटेन नहीं किया जाता है। संचालक ग्राहकों का पहचान पत्र और पता दर्ज नही करते जिससे ऐसी घटनाओं में वृद्धि होती है। इस उदासीनता के कारण कई बार आंतकी व आपराधिक चरित्र वाले लोग अपने मंसूबे को अंजाम देने में सफल हो जाते है।
इन सब के साथ साइबर पुलिस द्वारा साइबर अपराध के जाँच एवं कार्यवही में भी सिथिलिता बरती जा रही है। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते है की, ग्वालियर साइबर थाना में एक शिकायत 29  फ़रवरी को दी गयी, चार महीने से अधिक का समय बीत जाने के पश्चात भी पुलिस शिकायत पर कोई कार्यवाही नहीं की।
पुलिस की लचर जांच व्यवस्था का सबसे बड़ा सबूत है कि देश में 1995 में इंटरनेट आने के बाद से अब तक साइबर अपराध के तीन सिर्फ मुकदमों में ही सजा हो पाई है। पुलिस की कोताही का सबसे बड़ा नमूना तो नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े भी पेश करते हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक 2010 में पूरे देश में सिर्फ हजार के करीब साइबर अपराध दर्ज किए गए हैं। जबकि अखबारों में रोजाना इस तरह के मामलों की रिपोर्टिंग देखी जा सकती है।

>>कैसे बचें साइबर अपराधिओं के शिकार होने से?
   विशेषज्ञ कहते हैं कि साइबर बुलिंग और ब्लैकमेलिंग के मामलों में ज्यादातर देखा गया है कि पीड़ितों के करीबी ही इस तरह के काम को अंजाम देते हैं। इसलिए इंटरनेट यूजर्स को सर्फिंग करते वक्त अपनी पहचान को पूरी तरह से गुप्त और सुरक्षित रखना चाहिए। उनको अपना पासवर्ड छिपा कर रखना चाहिए। वहीं अभिभावकों को भी इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले अपने बच्चों पर नजर रखनी चाहिए। साथ ही बच्चों को साइबर अपराध के खतरों से भी अवगत कराना चाहिए।

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