दोस्तों! बहुत दिनों से मैं सत्ता और समाज के संबंध में लिखने से गुरेज़ करता रहा, किन्तु आज खुद को रोक नहीं सका|
आज देशभक्ति का अर्थ है चीखना और चिल्लाना !आपको थोड़ा अजीब लग सकता है यह, किन्तु हम लोग इसे किसी ना किसी रुप में स्वीकार चुके हैं|
भारत में संसद, टी.वी. न्यूज स्टूडियो में जहां चिल्लाहट का राज है वहीं सड़कों पर लम्पटता का बोलबाला है|
कभी- कभी तो मुझे ऐसा भी लगता है कि वर्तमान में चीखना ही वाक्कला का मुख्य रूप बन गया है। क्यों की हमारे नेता को संसद में और न्यूज चैनलों पर एंकरों को इतने जोर से चीखता देख यह समझना मुश्किल हो जाता है कि हमारे समाज का यह वर्ग चीख क्यों रहे हैं? इतने आधुनिक और संवेदनशील उपकरणों के होते हुए भला इन्हें चीखने की क्या जरूरत है?
एक तरफ जहां न्यूज चैनलों द्वारा आयोजित/प्रायोजित बहसों में एंकर, भागी, प्रतिभागी तथा विद्वान, पत्रकार सब चीख रहे होते हैं। वहीं देश की संसद में भी पक्ष, विपक्ष, अध्यक्ष सभी चीख रहे होते हैं।
हम सभी जानते हैं कि चिल्लाहट किसका गुण है, किसका स्वभाव और किसकी आदत है। हमारे समझ से तो वही चिल्लाता है जो गलत होता है। वही चिल्लाता है जो आदेश देता है। वही चिल्लाता है जिसके पास किसी किस्म की सत्ता होती है। हम रोज देखते हैं कि फैक्टरी में मैनेजर-सुपरवाइजर, खेत में मजदूर-धनी किसान आदि अक्सर चिल्लाते दिख जाते हैं, और इन सबकी चिल्लाहट तब और बढ़ जाती है जब इनके गलत होेने की स्पष्ट समझ सब ओर होती है; इनकी चिल्लाहट तब और बढ़ जाती है जब इन्हें कोई छोटी-बड़ी चुनौती मिलने लगती है।
देश मे शासक और पत्रकार (एंकर) तो चीख रहे हैं किन्तु शासित खामोश है| यहां मजदूर, किसान पीडि़त, शोषित सभी खामोश हैं, परन्तु कब तक? और कहां तक?
कही ये खामोशी तुफानी सन्नाटा तो नही!
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